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गुरु-मौन : जहाँ शब्द समाप्त होते हैं

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Dainik India News

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गुरु-मौन : जहाँ शब्द समाप्त होते हैं

हरेंद्र सिंह दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ।सनातन परंपरा में गुरु का अंतिम उपदेश शब्द नहीं, मौन है। जहाँ वाणी रुक जाती है, वहीं गुरुतत्त्व का वास्तविक क्षेत्र आरंभ होता है। शब्द मार्ग दिखा सकते हैं, किंतु सत्य का साक्षात्कार केवल मौन में घटित होता है। इसी कारण उपनिषदों ने कहा—“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।” जहाँ वाणी और मन लौट आते हैं, वहीं ब्रह्म का सान्निध्य है—और वही गुरु-मौन का प्रदेश है।

गुरु आरंभ में बोलता है, समझाता है, शास्त्र देता है। पर जैसे-जैसे शिष्य परिपक्व होता है, गुरु के शब्द कम होते जाते हैं। यह उपेक्षा नहीं, कृपा की पराकाष्ठा है। क्योंकि शब्द सहारा देते हैं, और मौन स्वतंत्र करता है। गुरु जब मौन होता है, तब वह शिष्य से यह अपेक्षा करता है कि अब वह बाहर नहीं, भीतर सुने।

गुरु-गीता इस मौन को अत्यंत गूढ़ संकेतों में व्यक्त करती है—

“मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वम्।”

अर्थात गुरु का मौन ही परब्रह्म की व्याख्या है। यह व्याख्या शब्दों में नहीं उतरती, क्योंकि यहाँ अर्थ नहीं, अनुभव संप्रेषित होता है। यह वही मौन है, जिसमें शिष्य को पहली बार बोध होता है कि गुरु कोई व्यक्तित्व नहीं, एक अवस्था है।
शब्द द्वैत में काम करते हैं—वक्ता और श्रोता। पर मौन अद्वैत में घटित होता है। वहाँ न कहने वाला होता है, न सुनने वाला—केवल बोध रहता है। गुरु-मौन शिष्य को इसी अद्वैत बोध की ओर ले जाता है। यही कारण है कि महान ऋषियों के जीवन में एक समय ऐसा आया, जब उन्होंने उपदेश देना छोड़ दिया और उपस्थिति बन गए।
गुरु-मौन का अर्थ चुप रहना नहीं, बल्कि ऐसी उपस्थिति है जो भीतर तक स्पर्श कर जाए। शिष्य जब गुरु के समीप बैठकर भी प्रश्न भूलने लगे, जब उत्तर की आवश्यकता समाप्त हो जाए—तभी समझना चाहिए कि गुरु-मौन ने कार्य करना प्रारंभ कर दिया है। यह मौन साधक को साधना से ऊपर उठाकर साक्षीभाव में प्रतिष्ठित करता है।


पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने इस अवस्था को “अंतःप्रेरणा का जागरण” कहा था। उनके अनुसार गुरु जब मौन हो जाता है, तब वह शिष्य के भीतर गुरु बनकर बोलने लगता है। यही अंतःगुरु का प्राकट्य है। बाह्य गुरु का मौन, आंतरिक गुरु की वाणी बन जाता है।
गुरु-मौन में साधक को पहली बार यह बोध होता है कि समाधान बाहर नहीं, दृष्टि के भीतर है। यही वह क्षण है जब साधक प्रश्नकर्ता नहीं रहता, द्रष्टा बनता है। और द्रष्टा के लिए शब्दों का आग्रह नहीं होता, क्योंकि वह जीवन को पढ़ने लगता है।

जहाँ व्यक्ति बोलने से पहले ठहरता है, प्रतिक्रिया से पहले मौन में उतरता है—वहीं गुरु-तत्त्व कार्यरत होता है। यह मौन कायरता नहीं, विवेक का उच्चतम रूप है।

आज का समाज शब्दों से भरा है, घोषणाओं से आक्रांत है। ऐसे समय में गुरु-मौन एक सांस्कृतिक तपस्या बन जाता है। यह मौन व्यक्ति को भीड़ से अलग नहीं करता, बल्कि उसे भीड़ के भीतर भी अडिग केंद्र प्रदान करता है।

अतः गुरु-मौन कोई शून्यता नहीं, परिपूर्णता है। यह वह बिंदु है जहाँ साधना समाप्त नहीं होती, बल्कि अस्तित्व बन जाती है। जहाँ गुरु नहीं बोलता, वहाँ जीवन स्वयं गुरु बनकर बोलने लगता है।
और तब शिष्य समझ पाता है—
गुरु ने कभी छोड़ा नहीं,
उन्होंने केवल शब्द छोड़ दिए।
यही गुरु-मौन है—
जहाँ प्रश्न गिर जाते हैं,
और सत्य शेष रह जाता है।

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