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गोवर्धन पूजा: सनातन संस्कृति की जीवित विरासत और ब्रज की आत्मा का पर्व

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Dainik India News

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गोवर्धन पूजा: सनातन संस्कृति की जीवित विरासत और ब्रज की आत्मा का पर्व

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।ब्रजभूमि की मृदुल धूल जब आज के दिन भी भगवान श्रीकृष्ण की पगचिह्नों को अपने में समेटे हुए है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं काल थम गया हो। मथुरा की पावन भूमि, वृंदावन के कुंज, और गिरिराज जी की गोद में बसी श्रद्धा — सब मिलकर आज भी उसी चमत्कारिक कथा को दोहरा रहे हैं, जो सहस्राब्दियों पहले घटी थी। यही वह दिन है, जब देवताओं के अहंकार पर भक्ति की विजय हुई थी, और जब प्रकृति स्वयं आराध्य बन उठी थी।

आज उसी दिव्य परंपरा को जीवंत करते हुए राष्ट्रीय सनातन महासंघ ने गोवर्धन पूजा और भैया दूज के पावन अवसर पर देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं अर्पित कीं। महासंघ के सदस्य जब वृंदावन के इस्कॉन मंदिर और मथुरा की गायत्री तपोभूमि पहुंचे, तो ऐसा लगा मानो युगों पुरानी परंपरा का पुनर्जागरण हो रहा हो। दीपों की पंक्तियाँ, शंखनाद की ध्वनि और गौसेवा की महक — सबने मिलकर एक ऐसा आध्यात्मिक वातावरण निर्मित किया, जहाँ हर मन भक्तिमय हो उठा।

गोवर्धन पूजा कोई मात्र अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह प्रकृति, श्रद्धा और सनातन दर्शन का त्रिवेणी संगम है। जिस क्षण बालकृष्ण ने इंद्र के गर्व को तोड़कर गिरिराज पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाया, उसी क्षण मानवता को यह शाश्वत संदेश मिला — कि धर्म का सार किसी बाह्य आडंबर में नहीं, बल्कि निस्स्वार्थ प्रेम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता में निहित है। यही कारण है कि आज भी ब्रज में जब “गिरिराज महाराज की जय” का उद्घोष गूंजता है, तो वह केवल जयघोष नहीं, बल्कि सनातन चेतना की अमर पुकार होती है।

और तभी ब्रजभूमि के हृदय में स्थित गायत्री तपोभूमि मथुरा अपनी दिव्य आभा से आलोकित होती है। यह वही भूमि है जहाँ साधना और सेवा का संगम हुआ, जहाँ से राष्ट्र को धर्म, संयम और संस्कार की दिशा मिली। जब राष्ट्रीय सनातन महासंघ के कार्यकर्ताओं ने वहाँ दीप प्रज्वलित किए, तो मानो उस ज्योति में ऋषियों की तपस्या, संतों की करुणा और भारत की आत्मा एक साथ दमक उठी। इस पावन स्थल की शीतल वायु आज भी कहती है — “धर्मो रक्षति रक्षितः” — जो धर्म की रक्षा करेगा, वही युगों तक अमर रहेगा।

गोवर्धन पूजा का अन्नकूट उत्सव इस अध्याय का भावनात्मक उत्कर्ष है। 56 भोगों से सजे थाल जब गिरिराज जी को अर्पित होते हैं, तो यह केवल भोग नहीं, बल्कि कृतज्ञता का विधान होता है। हर दाना, हर व्यंजन, मानो यह कहता है — “हे धरती, हे गौ माता, हे प्रकृति, तुम्हारे बिना हमारा अस्तित्व अधूरा है।” यह वही ब्रज का दर्शन है जहाँ भक्ति भूख से बड़ी है, और जहाँ अन्न को ईश्वर का रूप मानकर बाँटने की परंपरा जन्मी।

राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने इस अवसर पर कहा कि गोवर्धन पूजा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी द्वापर युग में थी। क्योंकि यह हमें सिखाती है — “भक्ति तब तक पूर्ण नहीं जब तक वह धरती और जीवों के प्रति करुणा से न जुड़ी हो।”

आज जब आधुनिकता के शोर में मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है, तब ब्रजभूमि से उठती यह आराधना हमें याद दिलाती है कि हमारी जड़ें इसी मिट्टी, इसी गाय, इसी गिरिराज और इसी संस्कृति में हैं। गोवर्धन पूजा इसलिए नहीं मनाई जाती कि हम परंपरा निभाएँ, बल्कि इसलिए कि हम यह न भूलें — हमारी आत्मा इसी सनातनता में बसती है।

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