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डायबिटीज का विस्फोट: कोरोना युग की अनसुलझी गुत्थियाँ और मरीजों की बढ़ती भीड़ का भयावह सच

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Dainik India News

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डायबिटीज का विस्फोट:  कोरोना युग की अनसुलझी गुत्थियाँ और मरीजों की बढ़ती भीड़ का भयावह सच

दैनिक इंडिया न्यूज़ 15 OCT 2025 नई दिल्ली। डायबिटीज आज किसी साधारण बीमारी का नाम नहीं, बल्कि हमारे समय का ऐसा महाविस्फोट है जिसकी धमक ने पूरी दुनिया की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की नींव हिला दी है। WHO, IDF और ICMR–INDIAB Study 2023 के ताज़ा आँकड़े भारत के सामने एक भयावह दर्पण खड़ा करते हैं—10.1 करोड़ लोग डायबिटीज की गिरफ्त में और 13.6 करोड़ उसके मुहाने पर। यह आंकड़े बीमारी नहीं, बल्कि एक भूकंप हैं, जिसका केंद्र बिंदु हमारे समाज, हमारी आदतों और हमारी आनुवंशिक विरासत में गहरे धँसा हुआ है। प्रश्न यह नहीं कि यह संकट कितना बड़ा है; प्रश्न यह है कि यह विस्फोट आखिर जन्मा कहाँ से?

डायबिटीज की कथा आनुवंशिकता से शुरू होती है, जहाँ एक अभिभावक की बीमारी संतान की नियति पर 40% तक तलवार बनकर लटक जाती है, और दोनों अभिभावक प्रभावित हों तो जोखिम 80% तक उछल जाता है। प्रकृति का धागा इतना ही कमजोर नहीं था, पर जीवनशैली ने इसे और भी जर्जर बना दिया। भोजन में फास्ट फूड की विषैली भरमार, मीठे पेयों पर निर्भरता, अनियमित दिनचर्या, निष्क्रिय जीवन और निरंतर मानसिक तनाव—ये सभी मिलकर शरीर को इंसुलिन के विरुद्ध विद्रोह की आग में झोंक देते हैं। ICMR की मानें तो भारत में 70% डायबिटीज मामलों के पीछे यही आधुनिकता का पतनशील चेहरा जिम्मेदार है।

जटिलताओं की बाढ़ किसी एक दिशा से नहीं आती; यह चारों ओर से बढ़ती हुई मौत की परछाई है। WHO के अनुसार डायबिटीज के रोगी में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम 2–4 गुना तक बढ़ जाता है, 52% मौतें हृदय रोगों से होती हैं, 30–40% किडनी फेल्योर इसी बीमारी का उपहार हैं, और रेटिनोपैथी से 20% तक मरीज अपनी दृष्टि खोने के कगार पर पहुँच जाते हैं। न्यूरोपैथी और डायबिटिक फुट की त्रासदी हर साल हजारों सर्जरी के रूप में अपने दाँत दिखाती है। यह आँकड़े सिर्फ संख्याएँ नहीं; यह धीमी, क्रूर और निरंतर चढ़ती हुई मृत्यु की एक ऐसी परतें हैं जिन्हें समाज ने अब तक गंभीरता से समझा ही नहीं।

और इसी कथा के केंद्र में एक ऐसा पात्र खड़ा है जो नायक भी हो सकता है और खलनायक भी—लिवर। शरीर का ग्लूकोज़ नियंत्रण केंद्र। वही लिवर जो ऊर्जा देता है, जरूरत के वक्त ग्लूकोज़ छोड़ता है, और ग्लूकोनियोजेनेसिस के द्वारा खुद ग्लूकोज़ बनाता है। पर जब इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ता है, तो यही लिवर एक अदृश्य बगावत पर उतर आता है—ग्लूकोज़ को अनियंत्रित रूप से बनाना शुरू कर देता है। परिणाम? फास्टिंग शुगर हर सुबह अपने ही रिकॉर्ड तोड़ने के लिए तैयार। Journal of Hepatology का अध्ययन बताता है कि टाइप–2 डायबिटीज के 70–75% मरीज NAFLD से पीड़ित हैं, जहाँ लिवर में वसा का जमाव इंसुलिन की शक्ति को नष्ट कर देता है। यदि समय रहते इसे रोका न जाए तो NAFLD धीरे-धीरे NASH बनता है और अंततः सिरोसिस के कगार तक ले जाता है—यह यात्रा ऐसी है जो शरीर को भीतर से खोखला कर देती है।

पर आश्चर्य यह है कि समाधान भी इसी लिवर के पास है। Lancet की शोध कहती है कि वजन में केवल 10% की कमी लिवर की चर्बी को 50% तक घटा सकती है। मात्र 10%—और इंसुलिन प्रतिरोध में ऐसा सुधार कि दवाइयाँ तक प्रभावी होने लगें। नियमित व्यायाम लिवर द्वारा बनने वाले अतिरिक्त ग्लूकोज़ को 20–30% तक कम कर देता है। कहने का अर्थ यह है कि जिस लिवर को बीमारी का महाप्रवर्तक कहा जाता है, वही स्वस्थ होकर इस रोग की सबसे शक्तिशाली ढाल बन सकता है। लिवर स्वस्थ है तो डायबिटीज काबू में रहती है; लिवर बीमार है तो डायबिटीज का इलाज हमेशा अधूरा ही रहता है।

अब आते हैं उस सवाल पर, जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों की नींद हराम कर दी है—COVID–19 के बाद डायबिटीज और ब्लड प्रेशर के मामलों में जो उछाल देखा गया है, उसका स्रोत आखिर है क्या? JAMA और Lancet दोनों इस वृद्धि को 40–60% तक बताते हैं। पर निर्णायक तथ्य यह है कि यह प्रश्न आज भी वैज्ञानिक समुदाय के बीच “अन्वेषणाधीन, जटिल और अत्यंत संवेदनशील” है। क्या यह उछाल COVID वायरस के कारण हुई मेटाबॉलिक क्षति से है? क्या यह वैक्सीनेशन के बाद शरीर में पैदा हुई प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं का परिणाम है? या फिर दोनों का संयुक्त प्रभाव है जिसने शरीर के मेटाबॉलिज़्म को अंदर से असंतुलित कर दिया है?

ICMR और AIIMS के अनुसार भारत में COVID संक्रमण के बाद 32–35% मरीजों में नए डायबिटीज मामलों का उभार देखा गया, विशेषकर उन लोगों में जिनमें पहले से प्री–डायबिटीज था। परंतु निर्णायक उत्तर अभी भी दूर है। वैज्ञानिक समुदाय निश्चित है केवल एक बात पर—मरीज बढ़े हैं, और चिंताजनक रूप से बढ़े हैं। पर इसका मूल कारण क्या है—संक्रमण, वैक्सीन, जीवनशैली, तनाव, स्टेरॉइड्स, या इन सभी का संयुक्त प्रभाव—यह प्रश्न अभी भी शोध की मेज पर सस्पेंस बना रखा है।

डायबिटीज सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि एक बहुआयामी संकट है जो शरीर, परिवार, समाज और स्वास्थ्य-प्रणाली चारों को एक साथ चीरता है। और यह लड़ाई हमें लिवर से शुरू कर, जीवनशैली पर खत्म करनी होगी—क्योंकि यही वह मार्ग है जो हमें इस बढ़ते हुए अंधकार से बाहर निकाल सकता है।

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