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थायरॉइड दवा में खतरनाक लेबलिंग की गलती: एबॉट इंडिया की लापरवाही से मौतें,

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Dainik India News

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थायरॉइड दवा में खतरनाक लेबलिंग की गलती: एबॉट इंडिया की लापरवाही से  मौतें,

चेयरमैन मुनीर शेख पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं?

दैनिक इंडिया न्यूज़ रिसर्च डेस्क। में कार्यरत बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी एबॉट इंडिया लिमिटेड एक गंभीर विवाद के केंद्र में आ गई है। साल 2023 में कंपनी की प्रसिद्ध थायरॉइड दवा थायरोनॉर्म के करोड़ों यूनिट बाज़ार में ऐसे गलत लेबल के साथ पहुंच गए जिन पर 25 एमसीजी छपा था, जबकि वास्तविक खुराक 88 एमसीजी थी। इस त्रुटि के चलते दो मरीजों की मौत हो चुकी है और दर्जनों की तबीयत बिगड़ने की खबरें सामने आईं।

थायरॉइड की दवा एक संवेदनशील हार्मोनल उपचार है। अगर 25 एमसीजी की जगह 88 एमसीजी खुराक गलती से ली जाए, तो हृदयगति असामान्य हो सकती है और मरीज को हार्ट अटैक तक आ सकता है। डॉक्टरों के अनुसार इस प्रकार की गलती दवा विनियमन की सबसे खतरनाक चूकों में से एक मानी जाती है।

यह कंपनी अमेरिका की दिग्गज मल्टीनेशनल फार्मा कंपनी Abbott Laboratories की भारतीय इकाई है, जिसका मुख्यालय शिकागो में है। भारत में यह एबॉट इंडिया लिमिटेड के नाम से जानी जाती है। इस भारतीय इकाई में 49% हिस्सेदारी मुनीर शेख के पास है, जो कंपनी के चेयरमैन भी हैं और फार्मा उद्योग में एक बड़े निर्माता के रूप में स्थापित हैं।

इतनी बड़ी चूक के बाद कंपनी ने केवल कुछ अखबारों में एक छोटा सा विज्ञापन देकर अपने बैच को वापस लेने की औपचारिकता निभाई। इस लापरवाही पर न तो भारत सरकार की किसी एजेंसी ने कठोर कार्रवाई की, न ही ड्रग कंट्रोल अथॉरिटी ने चेयरमैन या शीर्ष अधिकारियों से जवाबदेही मांगी।

मुनीर शेख, जो इस पूरे प्रबंधन ढांचे के सर्वोच्च पद पर हैं, उन पर अब तक कोई कानूनी या प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हुई है। उनका भारत के फार्मा बाजार में एक मजबूत प्रभाव माना जाता है, और इसी वजह से यह आशंका जताई जा रही है कि कंपनी को 'विशेष संरक्षण' मिल रहा है।

यह ध्यान देने योग्य है कि जब स्वदेशी कंपनियां जैसे पतंजलि, अडानी या अंबानी ज़रा सी चूक करें, तो उन पर मीडिया, न्यायपालिका और तथाकथित बुद्धिजीवियों का भारी दबाव बन जाता है। वहीं इस बहुराष्ट्रीय कंपनी की गंभीर लापरवाही पर ना कोई "मिलॉर्ड" टिप्पणी आती है, ना कोई आंदोलन, ना ही मीडिया में प्रमुखता से आलोचना होती है।

इस दोहरे रवैये ने भारत में दवा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या आम नागरिक की जान की कीमत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफे से कम आंकी जा रही है? क्या भारत की स्वास्थ्य प्रणाली ऐसे प्रभावशाली चेहरों के आगे असहाय हो गई है?

जनता और स्वास्थ्य से जुड़ी संस्थाओं को अब इस मुद्दे पर खुलकर बोलना होगा। आवश्यक है कि इस घातक लापरवाही के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों—विशेषतः मुनीर शेख—की जवाबदेही तय हो, और इस पर उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की मांग की जाए।

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