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क्या भारतीय नौकरशाही का ‘स्टील फ्रेम’ अब पुनर्निर्माण की मांग कर रहा है?

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Dainik India News

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क्या भारतीय नौकरशाही का ‘स्टील फ्रेम’ अब पुनर्निर्माण की मांग कर रहा है?

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की टिप्पणी ने केवल एक योजना नहीं, बल्कि भारतीय प्रशासनिक तंत्र की वैचारिक संरचना पर गंभीर प्रश्नचिह्न अंकित कर दिया है।

हरिंद्र कुमार सिंह दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ।कभी-कभी लोकतंत्र में कोई एक वाक्य वर्षों से जमी हुई निस्तब्धता को भंग कर देता है। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल द्वारा व्यक्त यह टिप्पणी कि "नीति निर्धारण व्यावहारिक होना चाहिए" केवल एक प्रशासनिक परामर्श नहीं, बल्कि शासन-तंत्र के अंतःकरण को संबोधित किया गया एक गंभीर संवैधानिक संकेत है। जिस प्रकार किसी चिकित्सक का स्पर्श रोग के वास्तविक स्थान को पहचान लेता है, उसी प्रकार राज्यपाल की यह टिप्पणी भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की उस पुरानी व्याधि की ओर संकेत करती है, जिसमें नीतियाँ लोकजीवन की वास्तविकताओं से अधिक फाइलों की औपचारिकताओं के अनुरूप आकार ग्रहण करती हैं। प्रश्न किसी स्कूटी योजना का नहीं है; प्रश्न उस दृष्टिकोण का है जिसमें नागरिक अंततः नीति का केंद्र न रहकर उसकी परिधि पर पहुँच जाता है। यही वह क्षण है जहाँ लोकतंत्र स्वयं अपने प्रतिबिंब को देखने के लिए बाध्य होता है।

यहीं से वह प्रश्न जन्म लेता है, जिससे वर्षों तक बचने का प्रयास किया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जिस प्रशासनिक व्यवस्था को राष्ट्र की स्थिरता का आधार माना गया, क्या वही व्यवस्था आज विकसित भारत की आकांक्षाओं को उसी सामर्थ्य से वहन कर पा रही है? सरदार वल्लभभाई पटेल ने भारतीय सिविल सेवा को "स्टील फ्रेम" कहा था, क्योंकि तत्कालीन भारत को दृढ़ता, अनुशासन और संस्थागत स्थायित्व की आवश्यकता थी। किंतु इतिहास का यह भी सिद्धांत है कि कोई भी संरचना केवल अपनी ऐतिहासिक महत्ता के कारण अनंतकाल तक अपरिवर्तित नहीं रह सकती। समय स्वयं सबसे बड़ा परीक्षक होता है, और आज वही समय इस तथाकथित "स्टील फ्रेम" की सामर्थ्य, प्रासंगिकता और अनुकूलनशीलता की परीक्षा ले रहा है।

विडंबना यह नहीं कि हमारी नीतियाँ असफल होती हैं; वास्तविक विडंबना यह है कि उनकी असफलता का अनुमान नागरिक पहले लगा लेता है और प्रशासन बाद में। योजनाएँ घोषणा के समय आदर्श प्रतीत होती हैं, किन्तु क्रियान्वयन के प्रथम चरण में ही उनकी सीमाएँ उजागर होने लगती हैं। पात्र व्यक्ति अपात्र सिद्ध हो जाता है, सरल प्रक्रिया जटिल भूलभुलैया में परिवर्तित हो जाती है, और जनकल्याण का संकल्प अंततः कागजी अनुपालन तक सीमित रह जाता है। यह संयोग नहीं, बल्कि उस नीति-दर्शन की परिणति है जिसमें व्यवहारिकता का स्थान औपचारिकता ने ग्रहण कर लिया है। शासन की सफलता का निर्धारण घोषणाओं से नहीं, बल्कि उस अंतिम नागरिक के अनुभव से होता है जिसके जीवन में नीति का वास्तविक स्पर्श पहुँचना चाहिए।

यदि समस्या केवल कुछ अधिकारियों तक सीमित होती तो उसका समाधान स्थानांतरण, अनुशासनात्मक कार्यवाही अथवा प्रशिक्षण से संभव था। किंतु समस्या कहीं अधिक गहन है। प्रशासनिक विज्ञान का मूल सिद्धांत है कि उत्कृष्ट व्यवस्था उत्कृष्ट व्यक्तियों पर निर्भर नहीं होती; वह ऐसी संस्थागत प्रक्रियाएँ निर्मित करती है जिनमें सामान्य क्षमता वाला व्यक्ति भी असाधारण परिणाम देने में समर्थ हो। भारत में अनेक विलक्षण प्रशासनिक अधिकारी हुए हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल से इतिहास रचा है। किंतु यदि किसी जिले की प्रगति किसी एक अधिकारी की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति पर निर्भर हो जाए, तो यह उस अधिकारी की सफलता नहीं, बल्कि संस्थागत दुर्बलता का प्रमाण है। सुदृढ़ लोकतंत्र व्यक्ति-प्रधान नहीं, प्रक्रिया-प्रधान होता है।

इसी संदर्भ में भारतीय चुनाव व्यवस्था एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करती है। विश्व का सबसे विशाल लोकतांत्रिक आयोजन करोड़ों मतदाताओं, लाखों कर्मचारियों और हजारों प्रशासनिक इकाइयों के मध्य बिना किसी व्यापक अराजकता के सम्पन्न हो जाता है। इसका श्रेय किसी एक अधिकारी को नहीं, बल्कि उस सुविकसित संस्थागत तंत्र को जाता है जिसमें प्रक्रियाएँ स्पष्ट, उत्तरदायित्व निश्चित और तकनीकी समन्वय अत्यंत सुदृढ़ है। यही कारण है कि विश्व के अनेक लोकतांत्रिक राष्ट्र भारतीय चुनाव प्रणाली का अध्ययन करते हैं। प्रश्न यह है कि यदि चुनाव जैसे जटिल कार्य में भारत विश्व का आदर्श बन सकता है, तो भूमि प्रबंधन, नगर प्रशासन, राजस्व, कराधान, निर्माण स्वीकृति और सार्वजनिक सेवाओं में वही दक्षता क्यों दिखाई नहीं देती?

इस प्रश्न का उत्तर प्रशासनिक संरचना की उस परत में निहित है जहाँ भर्ती, प्रशिक्षण, मूल्यांकन और उत्तरदायित्व का तंत्र आकार ग्रहण करता है। किसी भी संस्था का भविष्य उसके प्रवेश-द्वार पर निर्धारित हो जाता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा की चयन प्रक्रिया विश्व की सर्वाधिक कठिन परीक्षाओं में सम्मिलित है, किंतु आज शासन की आवश्यकताएँ केवल बौद्धिक क्षमता तक सीमित नहीं रहीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण, वित्तीय प्रबंधन, पर्यावरणीय चुनौतियाँ, साइबर सुरक्षा, व्यवहार विज्ञान, संवाद कौशल और परिवर्तनकारी नेतृत्व आधुनिक प्रशासन की अनिवार्य योग्यताएँ बन चुकी हैं। यदि चयन और प्रशिक्षण इन परिवर्तित अपेक्षाओं के अनुरूप विकसित नहीं होंगे, तो उत्कृष्ट प्रतिभाएँ भी पुरानी प्रक्रियाओं की सीमाओं में बंध जाएँगी।

वर्तमान समय विशेषज्ञता का युग है। चिकित्सा का संचालन चिकित्सक करते हैं, न्यायालय विधिवेत्ता संचालित करते हैं, विज्ञान वैज्ञानिकों के हाथों विकसित होता है, किंतु शासन के अनेक अत्यंत विशिष्ट क्षेत्रों में आज भी सामान्य प्रशासनिक दृष्टिकोण को पर्याप्त माना जाता है। यह व्यवस्था लंबे समय तक सफल रही, किंतु तकनीकी जटिलताओं वाले आधुनिक समाज में नीति निर्माण और क्रियान्वयन के बीच विशेषज्ञता की भूमिका निरंतर बढ़ती जा रही है। विकसित राष्ट्रों ने सामान्य प्रशासन और विषय विशेषज्ञों के बीच संतुलित सहभागिता का मॉडल विकसित किया है। भारत को भी इस दिशा में गंभीर विमर्श करना होगा।

इतना ही नहीं, प्रशासन की सफलता का मापदंड भी बदलना होगा। दशकों तक यह माना जाता रहा कि नियमों का अक्षरशः पालन ही सुशासन है। किंतु इक्कीसवीं शताब्दी का नागरिक परिणाम चाहता है, प्रक्रिया नहीं। उसके लिए यह महत्वहीन है कि फाइल कितने अनुभागों से होकर गुजरी; वह यह जानना चाहता है कि उसकी समस्या कितने समय में हल हुई। शासन का वास्तविक मूल्यांकन कार्यालयों की कार्यवाही से नहीं, नागरिक के अनुभव से होना चाहिए। यही परिणामोन्मुख प्रशासन की आधारशिला है।

पारदर्शिता और उत्तरदायित्व किसी भी लोकतांत्रिक प्रशासन के प्राणतत्व हैं। यदि निर्णय प्रक्रिया नागरिकों से दूर होती जाएगी, तो विश्वास का संकट भी उतना ही गहरा होगा। आधुनिक प्रौद्योगिकी ने यह अवसर दिया है कि प्रत्येक सरकारी सेवा समयबद्ध, डिजिटल, पारदर्शी और नागरिक-अनुकूल बनाई जा सके। किंतु तकनीक केवल उपकरण है; उसके पीछे संवेदनशील प्रशासनिक संस्कृति का होना अनिवार्य है। जब तक व्यवस्था नागरिक को याचक नहीं, अधिकार-संपन्न भागीदार के रूप में स्वीकार नहीं करेगी, तब तक तकनीकी प्रगति भी अपेक्षित परिवर्तन नहीं ला सकेगी।

यह भी उतना ही सत्य है कि भारतीय नौकरशाही ने राष्ट्र निर्माण, लोकतंत्र की स्थिरता, आपदा प्रबंधन, चुनाव संचालन, आर्थिक सुधार, ग्रामीण विकास तथा अनेक राष्ट्रीय उपलब्धियों में अविस्मरणीय योगदान दिया है। अतः सुधार की चर्चा को किसी संस्था अथवा अधिकारी के अवमूल्यन के रूप में देखना न्यायोचित नहीं होगा। किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है कि वह अपनी संस्थाओं की समीक्षा करने से भयभीत नहीं होता। समीक्षा विनाश का नहीं, परिष्कार का माध्यम होती है।

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की टिप्पणी का वास्तविक संदेश भी यही है कि शासन की आत्मा नागरिक के अनुभव में बसती है, न कि केवल प्रशासनिक अभिलेखों में। यदि नीति बनाते समय उस व्यक्ति की परिस्थितियों की कल्पना नहीं की जाएगी, जिसके लिए नीति बनाई जा रही है, तो वह नीति चाहे जितनी आकर्षक प्रतीत हो, अंततः अपने उद्देश्य से विचलित हो जाएगी। इसलिए आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि उस संपूर्ण संस्थागत दर्शन का पुनर्मूल्यांकन करने की है, जिसने दशकों तक प्रशासन को संचालित किया है।

विकसित भारत 2047 का स्वप्न केवल विशाल अर्थव्यवस्था, आधुनिक अवसंरचना अथवा तकनीकी उपलब्धियों से साकार नहीं होगा। उसका वास्तविक आधार एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था होगी जो दृढ़ भी हो और लचीली भी; अनुशासित भी हो और नवाचारी भी; नियमसम्मत भी हो और मानवीय भी। यदि "स्टील फ्रेम" समय की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को रूपांतरित कर लेता है, तो वह भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध होगा; और यदि वह परिवर्तन से विमुख रहता है, तो इतिहास स्वयं उसके पुनर्निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा। लोकतंत्र की यात्रा में सबसे स्थायी सत्य यही है कि अंततः वही व्यवस्था जीवित रहती है जो समय के साथ स्वयं को बदलने का साहस रखती है।

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