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बौद्धिक दासता या बौद्धिक दक्षता : जब समानता, विवेक को निगलने लगे- हरेंद्र सिंह

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बौद्धिक दासता या बौद्धिक दक्षता : जब समानता, विवेक को निगलने लगे- हरेंद्र सिंह

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।सभ्यताओं के उत्थान और पतन का इतिहास इस निर्विवाद सत्य की पुष्टि करता है कि किसी भी राष्ट्र का क्षरण सर्वप्रथम उसकी सीमाओं पर नहीं, बल्कि उसकी चेतना में आरंभ होता है। जब समाज प्रश्न पूछना छोड़ देता है, जब विचार आज्ञा का अनुगामी बन जाता है और जब विवेक अनुशासन के भय से मौन ओढ़ लेता है, तब पतन की प्रक्रिया बिना किसी उद्घोषणा के आरंभ हो जाती है। भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था आज ऐसे ही एक सूक्ष्म किंतु गहरे संकट के समक्ष खड़ी प्रतीत होती है—एक ऐसा संकट, जो न तो केवल प्रशासनिक है और न ही मात्र नीतिगत, बल्कि मूलतः बौद्धिक, नैतिक और सभ्यतागत है।


विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अधिसूचित यूजीसी–2026 के विनियम इसी संकट के प्रत्यक्ष प्रतीक के रूप में उभरे हैं। सतह पर ये विनियम समानता, समावेशन और सामाजिक न्याय की भाषा में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, किंतु उनके अंतर्निहित ढाँचे में प्रवेश करते ही यह प्रश्न अपरिहार्य हो जाता है कि क्या समानता का अर्थ विवेक का विस्तार है या विवेक का नियंत्रण। क्या न्याय का उद्देश्य चेतना को मुक्त करना है, या उसे संस्थागत संरचनाओं के माध्यम से अनुशासित करना।


भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा कभी भी केवल सूचना के संचरण की प्रक्रिया नहीं रही। वह आत्मबोध की साधना रही है—गुरु और शिष्य के मध्य संवाद, संशय और तर्क के माध्यम से विकसित होने वाली चेतना। उपनिषदों से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, ज्ञान की यात्रा प्रश्नों से निर्मित हुई है, आदेशों से नहीं। किंतु जब शिक्षा-तंत्र में निगरानी को नैतिकता का पर्याय और नियंत्रण को न्याय का उपकरण घोषित कर दिया जाता है, तब शिक्षा का स्वभाव ही परिवर्तित हो जाता है।


यूजीसी–2026 के अंतर्गत प्रस्तावित इक्विटी कमेटियाँ, इक्विटी एंबेसडर, इक्विटी स्क्वॉड और सतत शिकायत-निगरानी तंत्र इसी परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं। जब प्रत्येक असहमति संभावित शिकायत में रूपांतरित हो सकती है, जब प्रत्येक विचार को उसके बौद्धिक मूल्य के बजाय उसकी प्रशासनिक व्याख्या के चश्मे से देखा जाने लगे, तब विश्वविद्यालय साधना का स्थल नहीं रह जाता, बल्कि आत्म-संरक्षण का क्षेत्र बन जाता है। ऐसी स्थिति में शिक्षक ज्ञान का वाहक नहीं, जोखिम प्रबंधक बन जाता है; और छात्र जिज्ञासु नहीं, सतर्क उपभोक्ता।
दार्शनिक दृष्टि से यह स्थिति अत्यंत गंभीर है। प्लेटो ने जिस शिक्षा को आत्मा का आरोहण कहा था, वह यहाँ आत्मा का संकुचन बनती दिखाई देती है। कांट ने जिस विवेक को नैतिक स्वायत्तता का आधार माना, वह यहाँ संस्थागत स्वीकृति पर निर्भर प्रतीत होता है। यदि विचार करने से पहले अनुमति लेनी पड़े, तो वह विचार नहीं, केवल प्रतिक्रिया रह जाती है।


इन विनियमों की सबसे अधिक चिंताजनक विशेषता यह है कि असत्य अथवा दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के विरुद्ध दंड का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। यह स्थिति न्याय के उस मूल सिद्धांत को ही ध्वस्त करती है, जिसके अनुसार अधिकार और उत्तरदायित्व एक-दूसरे से पृथक नहीं हो सकते। मर्यादा-विहीन अधिकार भय को जन्म देता है, और भय ज्ञान का सबसे घातक शत्रु है। भय के वातावरण में न तो मौलिक चिंतन पनपता है, न ही वैचारिक साहस।


निगरानी आधारित शिक्षा-तंत्र धीरे-धीरे एक ऐसी मानसिकता का निर्माण करता है, जहाँ सत्य की खोज का स्थान सुरक्षित कथन ले लेते हैं। विचारों का मूल्य उनके नैतिक और बौद्धिक सामर्थ्य से नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक स्वीकार्यता से तय होने लगता है। यही वह अवस्था है जिसे बौद्धिक दासता कहा जा सकता है—जहाँ मन स्वतंत्र प्रतीत होता है, किंतु वस्तुतः अदृश्य संरचनाओं में जकड़ा होता है।


इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि जब भी शिक्षा सत्ता की सुविधा का उपकरण बनी है, तब उसने समाज की दिशा बदलने के बजाय सत्ता की रक्षा करना आरंभ कर दिया है। शिक्षा का मूल धर्म सत्ता से संवाद करना है, न कि उसका विस्तार बन जाना। यदि विश्वविद्यालय आलोचना से वंचित हो जाएँ, तो लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया बनकर रह जाता है, विवेक की संस्कृति नहीं।
इस विमर्श का एक और गहरा पक्ष है, जिसे प्रायः नारेबाज़ी के कोलाहल में दबा दिया जाता है। जब भी कोई असुविधाजनक प्रश्न उठता है, हम सहसा संविधान की दुहाई देने लगते हैं—मानो संविधान तर्कों को स्थगित करने का अंतिम मंत्र हो। किंतु संविधान का तात्पर्य केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके ईमानदार और संतुलित अनुप्रयोग से होता है। यदि समानता की बात है, तो उसका व्यवहारिक प्रमाण कहाँ है। यदि न्याय का दावा है, तो उसका अनुभव किसके जीवन में परिलक्षित होता है।


“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास”—यह वाक्य जब नीति का पर्याय बना, तब शायद ही किसी ने उसके अंतर्निहित अर्थ पर ठहरकर विचार किया। विश्वास का अर्थ प्रश्नहीन स्वीकृति नहीं होता। यदि विश्वास की माँग एकतरफा हो, यदि वह पहले आत्मसमर्पण और बाद में परिणाम स्वीकार करने की अपेक्षा करे, तो वह विश्वास नहीं, आज्ञाकारिता है। और आज्ञाकारिता तथा विवेक के मध्य का अंतर वही है, जो नागरिक और अधीनस्थ के बीच होता है—केवल भाषा और प्रतीक बदल जाते हैं।


औपनिवेशिक सत्ता का अंत केवल भौगोलिक प्रस्थान से नहीं होता। सत्ता के हस्तांतरण और चेतना की मुक्ति के बीच एक गहरी खाई होती है। अंग्रेज भले ही इस भूभाग से चले गए हों, किंतु क्या यह निस्संदेह प्रमाणित है कि हमने बौद्धिक स्वायत्तता पुनः प्राप्त कर ली। यदि आज भी हमारे सर्वाधिक सक्षम मस्तिष्क अपनी पहचान और सुरक्षा के लिए विदेशी संस्थानों की ओर देख रहे हैं, यदि अकादमिक प्रतिभा देश में अवसर के अभाव में पलायन को विवश है, तो यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि स्वतंत्रता कहीं केवल प्रशासनिक परिवर्तन तक ही सीमित तो नहीं रह गई।


एक राष्ट्र तब वास्तविक रूप से दुर्बल होता है, जब उसके सर्वाधिक सजग और सृजनशील मस्तिष्क अपने ही समाज में अप्रासंगिक, असुरक्षित या अवांछित अनुभव करने लगते हैं। यह कोई आकस्मिक विफलता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरचनात्मक उपेक्षा का परिणाम होता है। परिस्थितियाँ बदलती हैं, पर लक्ष्य वही रहता है—चेतन वर्ग को हाशिए पर धकेल देना, ताकि समाज दिशा नहीं, केवल गति में विश्वास करे।


यही वह बिंदु है जहाँ शिक्षा का प्रश्न केवल विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्र की आत्मा से जुड़ जाता है। यदि ज्ञान भय से संचालित होगा, तो शासन भले ही स्थिर दिखाई दे, समाज भीतर से रिक्त हो जाएगा। इतिहास गवाह है—जिस सभ्यता ने अपने प्रश्नकर्ताओं को चुप कराया, उसने अंततः अपने उत्तर भी खो दिए।


अंततः यह प्रश्न हमारे सम्मुख खड़ा है—क्या हम ऐसी शिक्षा चाहते हैं जो विवेक को पुष्ट करे, या ऐसी व्यवस्था जो केवल अनुशासन का विस्तार हो। यूजीसी–2026 के विनियम हमें एक अवसर भी प्रदान करते हैं—आत्मपरीक्षण का अवसर। यदि हमने इस अवसर को खो दिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ शायद प्रश्न नहीं पूछेंगी। और जिस समाज में प्रश्न समाप्त हो जाते हैं, वहाँ ज्ञान नहीं, केवल व्यवस्था शेष रह जाती है।
यही निर्णायक क्षण है। या तो हम विवेक को असुविधाजनक मानकर नियंत्रण की शरण लेंगे, या यह स्वीकार करेंगे कि प्रश्न ही वह मूल्य है जो राष्ट्र को जीवित रखता है। क्योंकि व्यवस्था के बिना समाज अव्यवस्थित हो सकता है, किंतु विवेक के बिना समाज निर्जीव हो जाता है।

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