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महाशिवरात्रि : अद्वैत-तत्त्व की परम महानिशा — परम पूज्य महामंडलेश्वर श्री अभयानंद सरस्वती जी महाराज

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महाशिवरात्रि : अद्वैत-तत्त्व की परम महानिशा — परम पूज्य महामंडलेश्वर श्री अभयानंद सरस्वती जी महाराज

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु चेतना के परम जागरण की वह दिव्य महानिशा है, जिसमें साधक भेद-बुद्धि का परित्याग कर अद्वैत-तत्त्व की अनुभूति की ओर अग्रसर होता है। यह रात्रि आत्मसंयम, आत्मनिग्रह और आत्मप्रकाश की त्रिवेणी है। उपवास यहाँ देहाभिमान के क्षय का संकेत है, जागरण चित्तशुद्धि का उपक्रम है, और जप-अर्चन अंतःकरण की निर्मलता का साधन है। यदि इस महापर्व को केवल कर्मकांड तक सीमित कर दिया जाए, तो उसके तात्त्विक और आध्यात्मिक आयामों का अवमूल्यन हो जाता है। वस्तुतः महाशिवरात्रि उस ब्रह्मतत्त्व के स्मरण की रात्रि है, जो शिव में भी है और नारायण में भी—जो सगुण में भी है और निर्गुण में भी।
पुराण-साहित्य में अनेक प्रसंग इस अद्वैत भाव को प्रतिपादित करते हैं। शिव महापुराण तथा स्कंद पुराण में वर्णित है कि भगवान शिव ने माता पार्वती को भगवान नारायण की दिव्य कथाएँ श्रवण कराईं। यह प्रसंग केवल भक्ति का संवाद नहीं, बल्कि तत्त्वदर्शन का उद्घोष है। स्वयं शिव कहते हैं—“नारायण हमारे आराध्य हैं”; और नारायण कहते हैं—“शिव हमारे अर्ध हैं।” यह परस्पर वंदना वेदांत के उस महावाक्य की प्रतिध्वनि है—“एकमेवाद्वितीयम्।” जब ईश्वर स्वयं अपने विविध रूपों में एक-दूसरे की स्तुति करते हैं, तब साधक के लिए यह संदेश स्पष्ट हो जाता है कि भेद केवल अनुभूति की सीमितता है, तत्त्व एक ही, अखंड और अभेद है।
गुरु गीता में भगवान शिव पार्वती को गुरु-तत्त्व का जो उपदेश देते हैं, वह महाशिवरात्रि की साधना को और अधिक गहन बना देता है। वहाँ गुरु को साक्षात् परब्रह्म कहा गया है—वही परब्रह्म कभी शिव रूप में, कभी विष्णु रूप में, और कभी निर्गुण-निराकार चेतना के रूप में प्रकट होता है। वेदांत का सिद्धांत—“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः”—इस रात्रि में अनुभवगम्य हो उठता है। जब साधक ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करता है, तब वह अपने भीतर स्थित चैतन्य-ब्रह्म का आवाहन करता है; और जब ‘नारायण’ का स्मरण करता है, तब उसी अखंड सत्ता का ध्यान करता है। नाम भिन्न हो सकते हैं, परंतु तत्त्व नितांत अभिन्न है।
वेदांत आश्रम के प्रमुख परम पूज्य महामंडलेश्वर श्री अभयानंद सरस्वती जी महाराज के वचनों में, “शिव और नारायण दो नहीं, अपितु एक ही परात्पर सत्य के द्विविध आलोक हैं।” यह अभिव्यक्ति संप्रदायगत सीमाओं का अतिक्रमण कर सनातन समन्वय की प्रतिष्ठा करती है। गीता का समत्वयोग और वेदांत का अभेदवाद इसी सत्य का समर्थन करते हैं कि परमात्मा विविध रूपों में पूजित होकर भी स्वभावतः अखंड है। अतः महाशिवरात्रि किसी एक परंपरा का सीमित उत्सव नहीं, बल्कि सनातन समरसता का सार्वकालिक संदेश है।


मानव जीवन में इस पर्व की अनिवार्यता इसी में निहित है कि यह हमें संकीर्णता से समग्रता की ओर, द्वेष से समत्व की ओर, और अहंकार से आत्मबोध की ओर ले जाता है। शिव का नीलकंठ स्वरूप त्याग, धैर्य और लोकमंगल का प्रतीक है; नारायण का करुणामय स्वरूप संरक्षण और पालन का। दोनों के अभेद का बोध ही पूर्णत्व का साक्षात्कार है। जब साधक इस रहस्य को आत्मसात् करता है, तब उसके भीतर से विभाजन का अंधकार विलीन हो जाता है और अद्वैत का प्रकाश प्रकट होता है।
अतः महाशिवरात्रि वह परम महानिशा है, जिसमें साधक शिव में नारायण और नारायण में शिव का दर्शन कर अखंड ब्रह्म की अनुभूति करता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि उपासना का चरम लक्ष्य किसी रूप-विशेष की प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि उस अनंत, अविनाशी, सर्वव्यापी परब्रह्म का साक्षात्कार है, जो समस्त रूपों में, समस्त नामों में और समस्त चेतनाओं में एकरस रूप से व्याप्त है। यही महाशिवरात्रि का परम संदेश है—अद्वैत का आलोक, समन्वय का संकल्प और आत्मब्रह्म की अनुभूति।

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