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महाशिवरात्रि पर संस्कृतभारती पूर्वी उत्तरप्रदेश क्षेत्र द्वारा दिव्य शिवार्चन

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Dainik India News

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महाशिवरात्रि पर संस्कृतभारती पूर्वी उत्तरप्रदेश क्षेत्र द्वारा दिव्य शिवार्चन

राष्ट्रकल्याण एवं विश्वसमन्वय हेतु की गई मंगलकामना- जितेंद्र प्रताप सिंह

दैनिक इंडिया न्यूज़ ,लखनऊ।महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर संस्कृतभारती के पूर्वी उत्तरप्रदेश क्षेत्र द्वारा महानगर लखनऊ स्थित कार्यालय-परिसर के शिवमंदिर में वैदिक-मंत्रोच्चार, रुद्राभिषेक एवं विधि-विधानपूर्वक शिवार्चन संपन्न किया गया। यह अनुष्ठान केवल पारंपरिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, अपितु सांस्कृतिक चेतना के पुनरुत्थान तथा राष्ट्रधर्म के संवर्धन का सशक्त संकल्प था। देवाधिदेव महादेव की आराधना के मध्य जब वेदमंत्रों का निनाद वातावरण में गुंजायमान हुआ, तब वह दृश्य मानो तप, त्याग और तत्त्वचिंतन की दिव्य त्रयी का मूर्त रूप प्रतीत हो रहा था।


इस पुण्य अवसर पर क्षेत्रीय संगठन मंत्री प्रमोद पंडित तथा क्षेत्रीय संपर्क प्रमुख जितेन्द्र प्रताप सिंह ने मंत्राभिषेक के साथ भगवान शिव-पार्वती का विधिवत् पूजन-अर्चन किया। उन्होंने समस्त राष्ट्र एवं भारतवासियों के लिए मंगलकामनाएँ अर्पित करते हुए यह उद्घोष किया कि महाशिवरात्रि आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और आत्मोद्धार का महामंत्र है। शिव का नीलकंठ स्वरूप हमें यह शिक्षा देता है कि विषमताओं के विष को धारण कर भी लोकमंगल की साधना की जा सकती है। अतः यह पर्व केवल व्यक्तिगत साधना का नहीं, अपितु सामूहिक कल्याण का भी दिव्य उपक्रम है।
अनुष्ठान के उपरांत वक्ताओं ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सनातन सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत राष्ट्र का वैश्विक दायित्व केवल भौतिक प्रगति तक सीमित नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आलोक के प्रसार में निहित है। सनातन धर्म का मूल संदेश समन्वय, समत्व और सार्वभौमिक करुणा है। भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद से विश्वबंधुत्व की भावना पुष्ट हो—इसी कामना के साथ विश्वकल्याण की प्रार्थना की गई। शिव का तत्त्व संहार में भी सृजन की संभावना देखता है; अतः वर्तमान वैश्विक परिवेश में जब असंतुलन और असमरसता की चुनौतियाँ विद्यमान हैं, तब शिवचेतना ही संतुलन और समरसता का आधार बन सकती है।


महाशिवरात्रि की यह साधना केवल अनुष्ठानिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मजागरण का आह्वान है। जब समाज संगठित होकर वेद-मंत्रों की पवित्र ध्वनि में शिव का स्मरण करता है, तब वह अपने सांस्कृतिक मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा करता है। संस्कृतभारती पूर्वी उत्तरप्रदेश क्षेत्र का यह आयोजन इस तथ्य का द्योतक है कि भाषा, संस्कृति और अध्यात्म परस्पर अभिन्न हैं। संस्कृत के माध्यम से व्यक्त शिवतत्त्व का चिंतन भारतीय अस्मिता को नवीन ऊर्जा प्रदान करता है।


अतः महाशिवरात्रि का यह दिव्य अनुष्ठान राष्ट्रनिष्ठा, आध्यात्मिकता और विश्वबंधुत्व का त्रिवेणी-संगम बनकर उभरा। शिव की कृपा से भारत राष्ट्र धर्म, ज्ञान और करुणा के आलोक से समस्त विश्व को आलोकित करे—इसी मंगलाभिलाषा के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। महादेव की अनुकम्पा से समस्त सृष्टि में शांति, समरसता और कल्याण की अखंड धारा प्रवाहित हो—यही इस महापर्व का परम संदेश है।

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