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"रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ धर्म, संस्कृति और भाईचारे की रक्षा का संकल्प"जेपी सिंह

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"रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ धर्म, संस्कृति और भाईचारे की रक्षा का संकल्प"जेपी सिंह

दैनिक इंडिया न्यूज़, नईदिल्ली। देशवासियों को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी सिंह ने इस पावन पर्व को केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित न मानकर इसे भारतीय संस्कृति के धर्म, वचन-पालन और आत्मीयता के अमर प्रतीक के रूप में मनाने का आह्वान किया है। इस अवसर पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से महासचिव हरिंद्र सिंह, प्रवक्ता कृष्णाचार्य के साथ वरिष्ठ संघ के अनेक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर यह संदेश दिया कि रक्षा-सूत्र का अर्थ केवल व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा का संकल्प भी है।रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम का उत्सव भर नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें गहरे पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यताओं में समाई हुई हैं। इसके मूल में त्याग, वचन-पालन, प्रेम और धर्म की रक्षा की भावना है। इसी भाव को उजागर करने वाली एक अद्भुत कथा भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और भक्तराज बलि से जुड़ी है, जो सावन पूर्णिमा के दिन घटित हुई मानी जाती है।पुराणों में वर्णन है कि त्रिलोक विजेता दानवराज बलि ने अपने बल, पराक्रम और दानशीलता से स्वर्गलोक तक पर अधिकार कर लिया था। देवताओं के संकट को देखकर भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और तीन पग भूमि का दान माँगा। बलि, जो वचन-पालन में अडिग थे, उन्होंने यह दान स्वीकार कर लिया। वामन रूपी विष्णु ने दो पग में पृथ्वी और आकाश को नाप लिया, तीसरे पग के लिए स्थान न होने पर बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया। भगवान ने उनके समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें पाताललोक का स्वामी बनाया, साथ ही वर दिया कि वे सदा उनके द्वारपाल बनकर रहेंगे।यह वरदान, बलि के लिए सम्मान का विषय था, परंतु इसके कारण भगवान विष्णु वैकुंठ छोड़कर पाताल में रहने लगे। देवी लक्ष्मी, जो अपने पति से अलगाव सहन नहीं कर पा रही थीं, इस स्थिति को बदलने के उपाय खोजने लगीं। उन्होंने एक ब्राह्मण स्त्री का वेश धारण किया और बलि के महल में गईं। बलि ने उनका स्वागत अतिथि के रूप में किया और उनसे आग्रह किया कि वे कुछ दिनों तक वहीं रहें। सावन पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी ने बलि की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा। बलि ने भावपूर्ण होकर उनसे वर मांगने को कहा।लक्ष्मी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करते हुए कहा कि वे भगवान विष्णु की पत्नी हैं और उन्हें अपने पति की वापसी चाहिए। बलि, जो धर्म और वचन-पालन के साथ-साथ अतिथि-सत्कार के भी महान प्रतीक थे, उन्होंने बिना किसी संकोच के विष्णु को वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। साथ ही, उन्होंने यह वरदान भी लिया कि हर वर्ष सावन पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी उनके पास आकर राखी बाँधेंगी और वे उन्हें सदा अपनी बहन मानेंगे।इस प्रकार रक्षाबंधन का यह स्वरूप केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक गहरे आध्यात्मिक अर्थ को भी दर्शाता है—जहाँ ‘रक्षा’ का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि संबंधों, वचनों और धर्म की रक्षा भी है। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि रक्षा-सूत्र का बंधन केवल रक्त संबंध का नहीं, बल्कि हृदय और आत्मा का भी हो सकता है।पौराणिक दृष्टि से, यह घटना धर्म और भक्ति के समन्वय का अद्भुत उदाहरण है। बलि जैसे असुर राजा का यह रूप, जिसमें उन्होंने देवाधिदेव विष्णु की पत्नी को बहन का स्थान दिया और अपने जीवन के सबसे बड़े सम्मान को छोड़ने में भी संकोच नहीं किया, यह दर्शाता है कि धर्म और प्रेम की भावना जाति, कुल और लोक से ऊपर है।सावन पूर्णिमा का यह पर्व, इसी कारण, केवल बहनों के लिए भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना का दिन नहीं, बल्कि आत्मीयता, त्याग और बंधुत्व के आदर्श का प्रतीक भी है। जब बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधती है, तो वह केवल एक धागा नहीं, बल्कि एक संकल्प बाँध रही होती है—धर्म की रक्षा, वचन की रक्षा और आपसी विश्वास की रक्षा का संकल्प।इस कथा में छिपा आध्यात्मिक संदेश यही है कि जीवन में संबंधों की रक्षा के लिए कभी-कभी त्याग करना आवश्यक होता है। चाहे वह बलि का अपने द्वारपाल के अधिकार का त्याग हो, या लक्ष्मी का अपने पति को वापस पाने के लिए बुद्धि और भक्ति का अद्भुत संगम—दोनों ही पक्ष धर्म और प्रेम के सर्वोच्च रूप को दर्शाते हैं। यही कारण है कि रक्षाबंधन का पर्व, पौराणिक संदर्भ में, भक्ति, त्याग और आत्मीयता के इस अद्भुत संगम का उत्सव बन जाता है।

समस्त देशवासियों को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए राष्ट्रीय सनातन महासंघ ने इस पावन पर्व को केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित न मानकर इसे भारतीय संस्कृति के धर्म, वचन-पालन और आत्मीयता के अमर प्रतीक के रूप में मनाने का आह्वान किया है। इस अवसर पर राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह, महासचिव हरिंद्र सिंह, प्रवक्ता कृष्णाचार्य के साथ वरिष्ठ संघ के अनेक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर यह संदेश दिया कि रक्षा-सूत्र का अर्थ केवल व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा का संकल्प भी है।

रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम का उत्सव भर नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें गहरे पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यताओं में समाई हुई हैं। इसके मूल में त्याग, वचन-पालन, प्रेम और धर्म की रक्षा की भावना है। इसी भाव को उजागर करने वाली एक अद्भुत कथा भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और भक्तराज बलि से जुड़ी है, जो सावन पूर्णिमा के दिन घटित हुई मानी जाती है।

पुराणों में वर्णन है कि त्रिलोक विजेता दानवराज बलि ने अपने बल, पराक्रम और दानशीलता से स्वर्गलोक तक पर अधिकार कर लिया था। देवताओं के संकट को देखकर भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और तीन पग भूमि का दान माँगा। बलि, जो वचन-पालन में अडिग थे, उन्होंने यह दान स्वीकार कर लिया। वामन रूपी विष्णु ने दो पग में पृथ्वी और आकाश को नाप लिया, तीसरे पग के लिए स्थान न होने पर बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया। भगवान ने उनके समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें पाताललोक का स्वामी बनाया, साथ ही वर दिया कि वे सदा उनके द्वारपाल बनकर रहेंगे।

यह वरदान, बलि के लिए सम्मान का विषय था, परंतु इसके कारण भगवान विष्णु वैकुंठ छोड़कर पाताल में रहने लगे। देवी लक्ष्मी, जो अपने पति से अलगाव सहन नहीं कर पा रही थीं, इस स्थिति को बदलने के उपाय खोजने लगीं। उन्होंने एक ब्राह्मण स्त्री का वेश धारण किया और बलि के महल में गईं। बलि ने उनका स्वागत अतिथि के रूप में किया और उनसे आग्रह किया कि वे कुछ दिनों तक वहीं रहें। सावन पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी ने बलि की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा। बलि ने भावपूर्ण होकर उनसे वर मांगने को कहा।

लक्ष्मी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करते हुए कहा कि वे भगवान विष्णु की पत्नी हैं और उन्हें अपने पति की वापसी चाहिए। बलि, जो धर्म और वचन-पालन के साथ-साथ अतिथि-सत्कार के भी महान प्रतीक थे, उन्होंने बिना किसी संकोच के विष्णु को वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। साथ ही, उन्होंने यह वरदान भी लिया कि हर वर्ष सावन पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी उनके पास आकर राखी बाँधेंगी और वे उन्हें सदा अपनी बहन मानेंगे।

इस प्रकार रक्षाबंधन का यह स्वरूप केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक गहरे आध्यात्मिक अर्थ को भी दर्शाता है—जहाँ ‘रक्षा’ का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि संबंधों, वचनों और धर्म की रक्षा भी है। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि रक्षा-सूत्र का बंधन केवल रक्त संबंध का नहीं, बल्कि हृदय और आत्मा का भी हो सकता है।

पौराणिक दृष्टि से, यह घटना धर्म और भक्ति के समन्वय का अद्भुत उदाहरण है। बलि जैसे असुर राजा का यह रूप, जिसमें उन्होंने देवाधिदेव विष्णु की पत्नी को बहन का स्थान दिया और अपने जीवन के सबसे बड़े सम्मान को छोड़ने में भी संकोच नहीं किया, यह दर्शाता है कि धर्म और प्रेम की भावना जाति, कुल और लोक से ऊपर है।

सावन पूर्णिमा का यह पर्व, इसी कारण, केवल बहनों के लिए भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना का दिन नहीं, बल्कि आत्मीयता, त्याग और बंधुत्व के आदर्श का प्रतीक भी है। जब बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधती है, तो वह केवल एक धागा नहीं, बल्कि एक संकल्प बाँध रही होती है—धर्म की रक्षा, वचन की रक्षा और आपसी विश्वास की रक्षा का संकल्प।

इस कथा में छिपा आध्यात्मिक संदेश यही है कि जीवन में संबंधों की रक्षा के लिए कभी-कभी त्याग करना आवश्यक होता है। चाहे वह बलि का अपने द्वारपाल के अधिकार का त्याग हो, या लक्ष्मी का अपने पति को वापस पाने के लिए बुद्धि और भक्ति का अद्भुत संगम—दोनों ही पक्ष धर्म और प्रेम के सर्वोच्च रूप को दर्शाते हैं। यही कारण है कि रक्षाबंधन का पर्व, पौराणिक संदर्भ में, भक्ति, त्याग और आत्मीयता के इस अद्भुत संगम का उत्सव बन जाता है।

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