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लखनऊ नगर निगम: सिस्टम से हारा एक पिता, जन्म प्रमाण पत्र के लिए भटक रहा है दर-दर

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Dainik India News

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लखनऊ नगर निगम:  सिस्टम से हारा एक पिता, जन्म प्रमाण पत्र के लिए भटक रहा है दर-दर

दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ, 28 मार्च 2025: प्रदेश सरकार अपने आठ साल के सफल कार्यकाल का दावा कर रही है, सुशासन और पारदर्शिता की मिसालें पेश की जा रही हैं, लेकिन लखनऊ नगर निगम के जोन-7 के बाबू शुक्ला जी जैसे अधिकारी सरकार के मंसूबों पर पानी फेर रहे हैं

एक पिता की जंग: जन्म प्रमाण पत्र के लिए संघर्ष

लखनऊ के एक पिता ने अपनी बिटिया का जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए नगर निगम का दरवाजा खटखटाया। उम्मीद थी कि यह प्रक्रिया सरल होगी, लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। नगर निगम के बाबू साहब ने पहले एसडीएम से प्रमाणित दस्तावेज लाने को कहा

पिता ने बिना कोई सवाल किए एसडीएम कार्यालय का रुख किया। वहां उसे एक वकील हायर करना पड़ा, कई औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ीं, और अंत में प्रमाण पत्र मिल गया। खुशी-खुशी वह नगर निगम के जोन-7 कार्यालय पहुंचा, लेकिन असली परेशानी तो अब शुरू हुई।

बाबू शुक्ला की 'सरकार'

जोन-7 के जन्म प्रमाण पत्र जारी करने वाले क्लर्क शुक्ला जी हर दो दिन बाद नया बहाना बनाते रहे। कभी कहते—"आज नहीं हो पाएगा", कभी—"कल आना", तो कभी—"फिर से कागज दिखाइए"। पिता बार-बार छुट्टी लेकर नगर निगम के चक्कर लगाता रहा, लेकिन हर बार सिर्फ तारीख मिली, प्रमाण पत्र नहीं

1076: सिर्फ आश्वासन, हल कुछ नहीं

थक-हारकर पिता ने 1076 पर शिकायत दर्ज कराई। वहां से आश्वासन तो मिला, लेकिन बाबू शुक्ला जी पर इसका कोई असर नहीं हुआ। मजबूर होकर नगर निगम के ZO से संपर्क किया गया। ZO साहब ने व्हाट्सएप पर कागज मंगवा लिए और भरोसा दिया कि जल्द ही काम हो जाएगा। लेकिन नगर निगम जोन-7 के शुक्ला जी के सामने ZO का आदेश भी बेअसर साबित हुआ

8 साल के सुशासन पर बड़ा सवाल

प्रदेश सरकार अपने 8 साल के ‘उत्तम कार्यकाल’ की घोषणा कर रही है, सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के दावे कर रही है। लेकिन जब राजधानी लखनऊ में एक पिता को अपनी बिटिया के जन्म प्रमाण पत्र के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ रही है, तो बाकी जिलों और कस्बों की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है

30 मार्च की आखिरी तारीख और पिता की बेबसी

अब इस कागज की मान्यता की आखिरी तारीख 30 मार्च हैपिता परेशान है, लाचार है, सिस्टम के आगे झुकने को मजबूर है। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार के आठ साल के दावों का यह असली चेहरा है? क्या सरकार को यह नहीं देखना चाहिए कि उसके अधिकारी उसके ही सुशासन मॉडल को ध्वस्त कर रहे हैं?

यह कोई एक पिता की कहानी नहीं है, बल्कि हर आम नागरिक की पीड़ा है। जब तक बाबूशाही की यह दीवारें नहीं गिरतीं, तब तक सरकार के सभी डिजिटल इंडिया और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के दावे महज कागजी घोषणाएं ही रह जाएंगीक्या कोई सुनेगा इस पिता की आवाज? क्या कोई उसके बिटिया का प्रमाण पत्र बनवाने की जिम्मेदारी लेगा? या फिर वह फिर से नगर निगम के उसी पुराने चक्कर में फंसकर रह जाएगा?

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