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व्यक्तित्व के समग्र रूपान्तरण की समर्थ चैतन्य शक्ति हमारा ‘गुरु तत्व’

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Dainik India News

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व्यक्तित्व के समग्र रूपान्तरण की समर्थ चैतन्य शक्ति हमारा ‘गुरु तत्व’

डॉ. विजय कुमार मिश्र, दैनिक इंडिया न्यूज़ हरिद्वार :आम व्यक्ति के अंदर गुरु को खोजने की परम्परा आम है, पर व्यापक दृष्टि से अनुभव करें तो गुरु कोई व्यक्ति नहीं, अपितु रूपांतरण की अनन्त दैवीय ऊर्जा से ओतप्रोत एक दिव्य तत्व है। गुरु एक चेतना है, संकल्प है, जागृति है, परिवर्तन का मूल है। मानवीय एवं ब्रह्माण्डीय चेतना के रूपांतरण की दैवीय धारा है गुरु। व्यक्ति के अंतःकरण जागरण, व्यक्ति के निर्माण की सम्पूर्ण पृष्ठभूमि गुरु चेतना के स्पर्श से तैयार होती है और मानव से मानव निर्माण की श्रृंखला बनकर विश्व भर में चेतनात्मक क्रांतियां घटित करती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ये क्रांतियां मनुष्य के अंतःचेतना में घटती हैं और उसके शरीर से होकर सामाजिक, वैश्विक परिधि को छूने में सफलता पाती हैं। अर्थात् गुरु वह चैतन्यता है, जिसके सान्निध्य से बाह्य एवं अंतःकरण दोनों पक्ष झकझोर उठते हैं। संत कबीर के भावों में कहें तोः-
लव लागी कल न पडै़, आप बिसरजत देंह।
अमृत पीवै आत्मा, गुरु से जुडै़ सनेह
।।

भगवान् शिव कहते हैं ‘अज्ञान के परिणाम स्वरूप प्रकटी यह अविद्या, जगत्, माया और शरीर आदि में जिसकी कृपा से सत्य ज्ञान का उदय होता है वह गुरु ही है। इस प्रकार भौतिक, अभौतिक, लौकिक और पारलौकिक सभी स्थिति में गुरु साथ खड़ा रहता है। ध्यान रहे अन्य रिश्ते कहीं न कहीं पहुंचकर रुक जाते हैं, पर गुरु का रिश्ता अटूट, अनन्त है, अनन्त जन्मों तक साथ निभाता हैः-
गूढ़ाविद्या जगन्माया, देहश्चाज्ञानसम्भवः।
विज्ञानं यत्प्रसादेन, गुरुशब्देन कथ्यते।।

गहराई से अनुभव करें तो माता-पिता मनुष्य को जन्म देते हैं, माँ उसे 9 महीने पेट में रखकर और 09 साल तक बाहर की दुनियां में संभालती है, 18 साल तक पिता संभालता है, लेकिन नौजवान होकर जब उसे पिता की उंगली छोड़कर अपनी जिंदगी स्वयं जीने का समय आता है, तो आगे की जिन्दगी सही ढंग से चलाने के लिए गुरु हाथ पकड़ता है। इस प्रकार गुरु का रिश्ता वर्तमान जीवन से भी आगे जन्मों तक साथ निभाता है। जन्म नया हो सकता है, लेकिन किसी न किसी विधान से हमें सम्हालने के लिए, संसार के भव बन्धन समझाने के लिए हमारा गुरु हम पर अपनी सूक्ष्म दृष्टि से कृपा बनाये रखता है। ऐसी ही अनन्त विशिष्टताओं के चलते हमारे ऋषियों ने धरा पर अनन्तकाल से गुरु वरण करने की परम्परायें स्थापित कीं और मानव जीवन को धन्य बनाये रखने का सौभाग्य दिया।

इस प्रकार गुरु तत्व व्यक्ति और शरीर से भी परे एक चेतन शक्ति रूप में इस धरा पर कार्य करता है। साथ ही अपने से जोड़े रखने के लिए युग अनुसार अनेक मंत्र-साधनानुशासन, सेवा आदि अभ्यास के नित्यानुसंधान हमें देकर जीवन से अन्धकार दूर करने की शक्ति एवं दृष्टि देता है। परिणामतः हर युग की विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए जीवन को आसान बनाता और ऊंचाई छूता है। अनन्तकाल से मानव को देवभाव से जोड़े रखने में गुरु ही हमारे सहायक एवं सचेतक रहे हैं।
गृ धातु से गुरु शब्द का निर्माण हुआ, इसमें गृ का अर्थ है निगल लेना। अर्थात गुरु वह जो शिष्य के पापों को निगलता है। दूसरे भाव से ’गु ’ का अर्थ है अन्धकार, ‘ रु ’ का है ‘प्रकाश’ अर्थात जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चले, अज्ञान से ज्ञान की ओर ले चले, सत्पथ-सुपथ, स्वस्ति-पथ पर ले चले वह गुरु कहलाता है। गुरु-शिष्य का रिश्ता प्रकाश, ज्ञान, भावना, साधना का रिश्ता है, जो शिष्य में ईश्वर का राजकुमार होने का गौरव जगाता है। इस धरा पर मात्र एक गुरुसत्ता ही है, जिसकी कृपा से सत्य व ज्ञान का अंतःकरण में उदय होता है और उलझनों से पार जाने की शक्ति मिलती है।

शास्त्र कहते हैं कि गुरु के चरणकमल अद्भुत मंगलकारी होते हैं, उनके सुमिरन, सान्निध्य, आशीष एवं सम्पर्क मात्र से शिष्य के कार्य पूर्ण होते हैं। गुरु साधक में श्री समृद्धि एवं अन्य कल्याणकारी शक्ति जागृत करता है, जिससे साधक में शांति, तृप्ति, करुणा एवं दिव्य आभा मण्डल का विकास होता है। गुरु साक्षात सतोगुण से युक्त शाश्वत तत्व रूप सत्य, प्रेम एवं न्याय के संयुक्त आधार शिवरूप हैं। गुरु अपनी कल्याणकारी शक्ति के साथ दीन, दुखियों, निर्बल पर कृपा करने वाले करुणा सागर हैं। साधक के प्राण, पुण्य, तप, सिद्धि के सम्पूर्ण आधार सद्गुरु हैं, इसीलिए उनकी भक्ति भावना से ध्यान, सुमिरन, प्रार्थना करने से हृदय में ज्ञान की वृद्धि होती है। गुरु पूर्ण चैतन्यमयी ज्योति स्वरूप हैं।
गुरु का मूल स्थान आनन्दलोक माना गया है। अर्थात् गुरु परमानन्द स्वरूप हैं और गुरु का व्यक्तित्व सदैव अपने शिष्यों की सद्इच्छाओं की पूर्ति की अभिलाषा से भरा रहता है। गुरु सात्चिक आनन्द स्वरूप हैं, ऐसे भाव के साथ गुरु सुमिरन से अंतःकरण में सत्य का प्राकट्य होता है। ब्रह्म कमल के समान परम पवित्र गुरु के अंतःकरण में सम्पूर्ण शास्त्र, श्रुति, वेद, गीता आदि का सहज प्राकट्य होता रहता है। इसीलिए जो शिष्य श्रद्धाभाव से गुरु का ध्यान करते हैं, उनका भी हृदय इन विद्याओं से भर उठता है। वास्तव में ग्रह, नक्षत्र सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उसी सद्गुरु तत्व की ही व्यापकता है।

सद्गुरु धर्म, अर्थ, मोक्ष सहित आठों सिद्धियों एवं नौ निधियों को प्रदान करने में समर्थ हैं। सद्गुरु का ध्यान करने से विशिष्ट ज्ञान, दिव्य विज्ञान एवं सिद्धियों की प्राप्ति होती है। गुरुतत्व धारण करने से ही इस जीवन को पूर्णता मिलती है। इसीलिए कहते हैं जिसने गुरुतत्व को जान लिया, उसे कुछ भी संसार में जानना शेष नहीं रह जाता। अतः सम्पूर्ण आंतरिक एवं बाह्य क्लेश एवं कष्ट से मुक्ति के लिए सद्गुरु का ध्यान आवश्यक है। सद्गुरु ब्रह्म के समान सर्वव्यापी है तथा जीव के समान अविनाशी है, गुरु की कृपा में सम्पूर्ण आत्मिक एवं बाह्य सुख समायें हैं।

सद्गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए संतों ने बताया कि सद्गुरु की कृपा होती है, तो सभी उस शिष्य पर अनायास कृपा करने लगते हैं। उसकी कृपा से मंदबुद्धि व्यक्ति बुद्धिशाली हो उठता है, गुरु साधना से साधक की दरिद्रता मिटती है। सभी प्रकार के दोष से वह मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति श्रद्धावनत होकर गुरुतत्व का वर्णन करता है, गुरु कृपा से घर में क्लेश, चिंता आदि सभी विकृतियां नष्ट होती हैं। संतानहीन की सूनी गोद गुरुकृपा से भर उठती है, घर-परिवार में सुख-समृद्धि की वर्षा होती है और सम्पूर्ण सुमंगल का वह अधिकारी बनता है। इसीलिए सद्गुरु जीवन के भाग्य विधाता कहे गये हैं, क्योंकि वही शिष्य को शुभ शक्ति एवं शुभ भक्ति देकर उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

जो भी व्यक्ति गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करता है, उसके जीवन में सुख, संतोष एवं सौभाग्य का सहज जागरण हो उठता है। इसीलिए मानव जीवन की सर्वतोमुखी सफलता के लिए सद्गुरु से दीक्षित होना अर्थात् जीवन में गुरु से जुड़ना व गुरु दीक्षा लेना अत्यावश्यक है। गुरु के सुमिरन व चित्त में स्मरण मात्र से शिष्य के अंतःकरण में करुणा का जागरण होता है और उसका आलस्य, पाप दूर होता है तथा शिष्य अविद्या से मुक्ति पाता है। गुरुमंत्र का ध्यान, सुमिरन करने वाली नारी अखण्ड सौभाग्यशाली बनती हैं तथा चित्त सदैव अडिग एकनिष्ठ बना रहता है।

सत्यनिष्ठ साधकों को गुरु ध्यान से ब्र्रह्म विद्या की प्राप्ति होती है, और ऐसे साधकों का सहसधार स्थित ब्रह्मकमल खिल उठता है। गुरुध्यान से जीवन में समृद्धि, तप के प्रति उत्साह जगता है, दिव्य तेज प्रकाशित होता है तथा जीवन एवं हृदय से दुख, दरिद्र एवं कुमति, कुविचार भावों का नाश होता है। यही नहीं गुरु ब्रह्म बीज के अनुसंधान कर्त्ता कहे गये हैं, इसीलिए जो शिष्य गुरुत्व का अनुसंधान करने में संलग्न हैं, उसकी सराहना साक्षात् परमात्म सत्ता स्वयं करता है।

कहते हैं जब जन्मों के पुण्य जीवन में प्रकाशित होते हैं, तभी सद्गुरु की सेवा के लिए मन में उल्लास जगता है। सद्गुरु की सेवा करने से अंतः में भक्ति का प्राकट्य होता है, इस प्रकार गुरु भक्ति जगने से गुरु की कृपा मिलती है और सद्गुरु की कृपा से मन में सत्य, न्याय, प्रेम करुणा आदि देवत्व से ओत-प्रोत दिव्य तत्वों के प्रति विश्वास जगता है। देवत्व के प्रति विश्वास जगने से सूक्ष्म चेतना की ध्यान वृत्तियां आदि अंतःकरण में जागृत होती हैं। इस प्रकार गुरु के ध्यान से जीवन का आवागमन चक्र समाप्त होता है और सुख, सम्पत्ति, ऐश्वर्यमयी शक्तियों का जागरण होता है। इसलिए ऋषि, मुनि, संत, तपस्वी, योगी, सिद्ध, असिद्ध, अघोरी, निराकारवादी, नास्तिक आदि सभी ने अपने-अपने ध्यान का आधार सद्गुरु को ही बनाया है, क्योंकि गुरुतत्व ही एक मात्र कल्याण का मार्ग है। गुरुतत्व का ध्यान करते ही अंतः करण पुलकित हो उठता है और साधक का मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है।

भगवान् शंकर स्वयं कहते हैं ‘यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः।’अर्थात जो गुरु है वही शिव है, जो शिव है उसे ही गुरु रूप में समझो। जीवन में गुरु-शिष्य के मिलन से नव चेतना का सृजन सम्भव होता है। गुरु के पीछे से देवी-देवता खडे़ होकर अपनी कृपायें बरसाते हैं। सारे ग्रह-नक्षत्र की कृपायें ऊपर पड़ती हैं। सम्पूर्ण गुरु परम्पराओं के साथ साक्षात नारायण की कृपा मिलती है। इसीलिए सद्गुरु की कृपाओं से हमारे भाग्य का निर्माण होता है और अंदर के दुःख-दारिद्रय बाहर निकलने शुरू होते हैं। जब भाग्य की जड़ों में गुरु एक-एक बूंद कृपा गिराता है, तो शिष्य के भाग्य की खेती लहराने लगती है। सौभाग्य-धन-वैभव, ऐश्वर्य के फल जीवन में लगने लगते हैं।

सदियों से ऐसी ही गुरु शिष्य परम्परा के बल पर मानवता धन्य होती रही है। हमारी सनातन संस्कृति के साधकों को व्यक्ति की परिधि से परे होकर तात्विक चेतना से समर्थ गुरु परम्परा की जरूरत है। जिससे मानव जीवन, मानवता एवं मानवीय संस्कृति लहलहा उठे। मानव में देवत्व और धरती पर स्वर्ग का अवतरण सम्भव हो सके। आईये अपने अंतःकरण में हम हर सीमाओं से मुक्त कर देने वाले गुरु को जगायें, जीवन व युग को सौभाग्यशाली बनायें।

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