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हरियाणा के समालखा में संघ की उच्चस्तरीय बैठक में संगठनात्मक पुनर्रचना पर मंथन, प्रांतीय व्यवस्था के स्थान पर संभागीय संरचना की संभावित तैयारी

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Dainik India News

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हरियाणा के समालखा में संघ की उच्चस्तरीय बैठक में संगठनात्मक पुनर्रचना पर मंथन, प्रांतीय व्यवस्था के स्थान पर संभागीय संरचना की संभावित तैयारी



शताब्दी वर्ष के कारण तत्काल नियुक्तियों पर विराम; भविष्य में अधिक विकेन्द्रित और सशक्त संगठनात्मक ढाँचे की रूपरेखा पर गंभीर विचार


दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली/चंडीगढ़।
हरियाणा के समालखा नगर में सम्पन्न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उच्चस्तरीय बैठक में संगठन की भावी संरचना, विस्तार की दिशा तथा कार्यप्रणाली के पुनर्संतुलन को लेकर व्यापक और गंभीर विचार-विमर्श किया गया। संघ की सर्वोच्च नीति-निर्धारक संस्था अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के समक्ष संगठन की आगामी शताब्दी यात्रा, सामाजिक विस्तार और संगठनात्मक सुदृढ़ीकरण जैसे विषयों पर दीर्घ मंथन हुआ, जिसने भविष्य में संभावित संरचनात्मक परिवर्तन की चर्चा को बल प्रदान किया है।


सूत्रों के अनुसार बैठक के दौरान संघ की वर्तमान प्रांतीय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर विचार किया गया। संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने इस बात पर विमर्श किया कि समय की आवश्यकता को देखते हुए संगठनात्मक संरचना को अधिक प्रभावी, गतिशील तथा समाज के निकट बनाने के लिए संभागीय व्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सकता है। इस प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य संगठन के कार्य को ग्राम, नगर और मोहल्ला स्तर तक अधिक सुव्यवस्थित रूप में पहुँचाना बताया जा रहा है।


हालाँकि संघ के शताब्दी वर्ष के व्यापक आयोजनों को ध्यान में रखते हुए अभी किसी प्रकार के व्यापक पुनर्गठन अथवा नवीन दायित्व निर्धारण की औपचारिक घोषणा से परहेज़ किया गया है। संघ नेतृत्व का मत है कि शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की पूर्णता के पश्चात ही संगठनात्मक पुनर्रचना की प्रक्रिया को क्रमिक रूप से लागू करना अधिक उपयुक्त होगा, जिससे संगठन की निरंतरता और अनुशासन दोनों सुरक्षित रह सकें।
सूत्रों से प्राप्त संकेतों के अनुसार प्रस्तावित संरचना के अंतर्गत सम्पूर्ण देश को लगभग नौ प्रमुख क्षेत्रों तथा लगभग पचासी संभागीय इकाइयों में व्यवस्थित करने की रूपरेखा पर विचार किया जा रहा है। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य संगठन के निर्णयों को अधिक त्वरित बनाना, स्थानीय नेतृत्व को सशक्त करना तथा समाज के विविध वर्गों के साथ संगठन के संपर्क को और अधिक सुदृढ़ करना बताया जा रहा है।


उत्तर भारत के संदर्भ में भी इस प्रस्तावित ढाँचे के अंतर्गत महत्वपूर्ण परिवर्तन की संभावना व्यक्त की जा रही है। सूत्रों का संकेत है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को मिलाकर एक उत्तर क्षेत्र के रूप में व्यवस्थित किया जा सकता है, जबकि दोनों राज्यों में पृथक-पृथक संभागीय इकाइयाँ संगठनात्मक गतिविधियों का संचालन करेंगी।


विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के विषय में यह चर्चा सामने आई है कि राज्य को सांस्कृतिक, भौगोलिक और संगठनात्मक दृष्टि से लगभग दस संभागों में विभाजित किया जा सकता है। इनमें मेरठ, ब्रज, बरेली, लखनऊ, कानपुर, झाँसी, प्रयाग, अयोध्या, काशी तथा गोरखपुर जैसे प्रमुख क्षेत्रीय केन्द्रों को संगठनात्मक धुरी के रूप में विकसित करने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
इसी प्रकार पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में संगठनात्मक गतिविधियों को अधिक व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से कुमाऊँ और गढ़वाल को दो पृथक संभागीय इकाइयों के रूप में सुदृढ़ करने का विचार भी मंथन में सामने आया है। संघ के जानकारों का मानना है कि पर्वतीय परिस्थितियों को देखते हुए इस प्रकार की संरचना वहाँ के सामाजिक कार्यों और संगठनात्मक संवाद को अधिक गति प्रदान कर सकती है।


संघ से जुड़े जानकारों का मत है कि यह प्रस्तावित पुनर्रचना केवल प्रशासनिक परिवर्तन नहीं, बल्कि संगठन की दीर्घकालिक कार्यनीति का अंग है। बीते वर्षों में संघ ने सेवा कार्य, सामाजिक समरसता, ग्रामोन्नति, पर्यावरण संरक्षण तथा पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण जैसे विषयों को विशेष प्राथमिकता दी है। ऐसे में संगठनात्मक ढाँचे को भी उसी अनुरूप अधिक सुदृढ़ और गतिशील बनाने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।


यद्यपि इस विषय में अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, तथापि हरियाणा की इस बैठक में हुआ यह गहन मंथन भविष्य में व्यापक परिवर्तन की भूमिका के रूप में देखा जा रहा है। यदि प्रस्तावित ढाँचा मूर्त रूप धारण करता है तो यह संगठन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय सिद्ध हो सकता है, क्योंकि इससे संगठन की जड़ें समाज के और अधिक व्यापक तथा सूक्ष्म स्तरों तक सुदृढ़ रूप से स्थापित होने की संभावना प्रबल मानी जा रही है।


स्पष्ट है कि समालखा में सम्पन्न यह बैठक केवल वर्तमान गतिविधियों की समीक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि आने वाले समय में संगठन की दिशा, संरचना और कार्यपद्धति को नई दृष्टि प्रदान करने का संकेत भी दे गई है। अब सबकी दृष्टि इस पर केंद्रित है कि यह मंथन आगे चलकर किस प्रकार के ठोस निर्णयों का रूप ग्रहण करता है और उसका प्रभाव देश के सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिदृश्य पर किस रूप में परिलक्षित होता है।

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