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"संवैधानिक पद से सियासी विदाई: धनखड़ का इस्तीफा सत्ता और मर्यादा के बीच खड़ा प्रश्न"

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Dainik India News

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"संवैधानिक पद से सियासी विदाई: धनखड़ का इस्तीफा सत्ता और मर्यादा के बीच खड़ा प्रश्न"

दैनिक इंडिया न्यूज़ ,नई दिल्ली।भारतीय गणराज्य की संसदीय परंपरा में एक अप्रत्याशित किंतु महत्वपूर्ण घटनाक्रम का उद्भव उस समय हुआ, जब राज्यसभा के पदेन सभापति तथा उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने अपने पद से त्यागपत्र प्रदान किया। यह त्यागपत्र माननीय राष्ट्रपति महोदय द्वारा स्वीकार कर लिया गया, जिसकी विधिवत अधिसूचना भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा राजपत्र में प्रकाशित की गई। इस प्रकार, संविधान के अनुच्छेद 68 के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का पद औपचारिक रूप से रिक्त घोषित किया गया।

श्री धनखड़ का यह त्यागपत्र न केवल एक व्यक्तिगत निर्णय के रूप में देखा जा रहा है, अपितु उसकी पृष्ठभूमि में राजनीतिक, संवैधानिक और संस्थागत समन्वय के विविध संकेत भी विद्यमान हैं। विदाई की सामान्य संसदीय परंपरा का अभाव—न कोई विदाई समारोह, न ही कोई विदाई भाषण—संपूर्ण राजनीतिक और संवैधानिक वृत्त को एक नवीन प्रश्नचिह्न के समक्ष उपस्थित करता है।

मंगलवार प्रातः 11 बजे, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी ने सदन की कार्यवाही का प्रारंभ करते हुए गृह मंत्रालय द्वारा प्रेषित अधिसूचना को वाचन के माध्यम से समस्त सदन को सूचित किया। उस क्षण श्री धनखड़ की अनुपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही, जो सामान्यतः पीठासीन अधिकारी के विदाई अवसर पर संसद के इतिहास का अविभाज्य अंग होती है। उनके द्वारा स्वयं यह उद्घोषणा की गई कि वे किसी प्रकार का विदाई भाषण नहीं देंगे—यह कथन स्वयं में अनेक अर्थ संकेत करता है।

राजनीतिक गलियारों में ऐसी ध्वनि भी प्रसारित हो रही है कि सरकार ने इस त्यागपत्र को सहर्ष स्वीकार किया, और संभवत: यह संपूर्ण निर्णय सत्ता पक्ष की मूक सहमति से संपन्न हुआ। इससे पूर्व यह अनुमान व्यक्त किया जा रहा था कि प्रधानमंत्री अथवा शीर्ष नेतृत्व श्री धनखड़ को पदत्याग से पूर्व पुनर्विचार हेतु प्रेरित कर सकते हैं, परंतु उस संभावना पर गृह मंत्रालय की अधिसूचना ने पूर्णविराम लगा दिया।

इस त्यागपत्र के पश्चात अब उपराष्ट्रपति के सरकारी आवास को त्यागकर, श्री धनखड़ को लुटियन दिल्ली क्षेत्र में वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप एक विशिष्ट श्रेणी का निवास प्राप्त होगा। साथ ही, पूर्व उपराष्ट्रपति होने के नाते उन्हें अपेक्षित सुरक्षा व सुविधाएं यथानियम प्रदत्त होंगी।

जहाँ तक चुनाव की बात है, संविधान में उपराष्ट्रपति पद की रिक्तता की स्थिति में "यथाशीघ्र" चुनाव कराए जाने का प्रावधान है, परंतु इसमें कोई नियत काल सीमा निर्दिष्ट नहीं है। यह स्थिति राष्ट्रपति पद की रिक्तता से भिन्न है, जहाँ छह माह के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है। अतः सरकार इस संदर्भ में संभावित प्रतीक्षा की भूमिका में प्रतीत होती है, और संभव है कि यह निर्णय आगामी सत्रों अथवा राजनीतिक समीकरणों की दृष्टि से लिया जाए।

राजनीतिक दृष्टि से यह त्यागपत्र इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि विगत समय में श्री धनखड़ की न्यायपालिका विषयक टिप्पणियाँ तथा कुछ संवेदनशील प्रकरणों में सक्रियता से सत्तापक्ष में असहजता उत्पन्न हुई थी। विशेषकर जस्टिस यशवंत वर्मा के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव के संदर्भ में उनकी तत्परता से सत्ता पक्ष की रणनीति बाधित हुई मानी गई थी। इसके अतिरिक्त, कुछ महत्वपूर्ण बैठकों में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति भी इस घटना के सूक्ष्म संकेतों को उजागर करती है।

विपक्ष की ओर से यह आरोप भी प्रतिपादित हुआ कि इस त्यागपत्र के पीछे राजनीतिक दबाव विद्यमान था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश तथा राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जैसे नेताओं ने इस निर्णय को ‘संघीय दबाव’ की संज्ञा दी है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री धनखड़ के योगदान की प्रशंसा करते हुए इसे एक गरिमामयी सेवाकाल कहा।

अब भारतीय संसद की आगामी प्रक्रिया एक नये उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की ओर अग्रसर होगी। यह निर्वाचन न केवल संवैधानिक आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा, बल्कि वह सत्ता व विपक्ष के वर्तमान और भविष्यत् समीकरणों को भी दिशा प्रदान करेगा। एनडीए गठबंधन को लोकसभा में बहुमत प्राप्त है, किंतु राज्यसभा की स्थिति तुलनात्मक रूप से जटिल है। ऐसे में सहयोगी दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। विपक्षी INDIA गठबंधन भी इस अवसर को सरकार के विरोध में एकजुटता के प्रदर्शन हेतु प्रयुक्त कर सकता है।

समापनत: यह कहा जा सकता है कि श्री धनखड़ का त्यागपत्र मात्र एक प्रशासनिक या व्यक्तिगत निर्णय नहीं है, अपितु यह घटना भारतीय संवैधानिक प्रणाली के भीतर विद्यमान शक्ति-संतुलन, संस्थागत स्वायत्तता और लोकतांत्रिक परिपक्वता की पुनः विवेचना का सजीव अवसर प्रदान करती है। यह घटनाक्रम न केवल वर्तमान व्यवस्था की स्थिरता को चुनौती देता है, बल्कि भविष्य में संवैधानिक पदों की गरिमा और निष्पक्षता की पुनर्स्थापना की भी अपेक्षा उत्पन्न करता है।

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