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स्मार्ट मीटर की बड़ी गड़बड़ी का पर्दाफाश: एक माह में ₹30,000 का बिल, शिकायतें हवा में, उपकेंद्र का तिरस्कार—वयोवृद्ध उपभोक्ता न्याय के लिए भटकने को मजबूर

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स्मार्ट मीटर की बड़ी गड़बड़ी का पर्दाफाश: एक माह में ₹30,000 का बिल, शिकायतें हवा में, उपकेंद्र का तिरस्कार—वयोवृद्ध उपभोक्ता न्याय के लिए भटकने को मजबूर

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। राजधानी के अलीगंज क्षेत्र में बिजली विभाग की लापरवाही और संवेदनहीनता का ऐसा मामला सामने आया है जिसने स्मार्ट मीटर व्यवस्था की पारदर्शिता पर सीधा सवाल उठा दिया है। 70 वर्ष से ऊपर के रजनीकांत उपाध्याय, जो लगातार वर्षों से समय पर बिजली बिल जमा करते आए हैं, अचानक एक ऐसे झटके के शिकार हो गए जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती—एक माह से भी कम अवधि का लगभग ₹30,000 का बिल। विभाग ने महज 20–25 दिनों की अवधि में 4551 यूनिट की खपत दिखाकर सारा भार सीधे उपभोक्ता पर डाल दिया।

गड़बड़ी यहीं खत्म नहीं होती। मीटर बदलने के दौरान जारी सीलिंग प्रमाणपत्र में जिस मीटर संख्या 02080046075 का उल्लेख किया गया है, वह उपभोक्ता के किसी भी मीटर से मेल नहीं खाती। उपभोक्ता के पुराने मीटर की संख्या W74421 थी और नया स्मार्ट मीटर SC10855785 है, लेकिन दस्तावेज़ में इन दोनों का कोई उल्लेख नहीं। इससे बड़ा सवाल क्या हो सकता है कि विभाग ने आखिर किस मीटर की रीडिंग को आधार बनाकर इतना बड़ा बिल तैयार कर दिया? स्थिति और भी चौंकाती है जब सीलिंग प्रमाणपत्र में पुराने मीटर की रीडिंग ‘00’ लिखी गई और तारीख तक दर्ज नहीं की गई। ऐसा लगता है मानो मीटर बदलने की प्रक्रिया जल्दबाज़ी में नहीं बल्कि लापरवाही और गैरजिम्मेदारी में की गई हो।

रजनीकांत उपाध्याय बताते हैं कि जुलाई 2025 तक उन्होंने हर माह नियमित बिल अदा किया है और उनका बिल कभी सात हजार रुपये से अधिक नहीं गया। इसके बावजूद अगस्त 2025 के कुछ दिनों का बिल तीस हजार रुपये बना दिया गया। यही नहीं, नवंबर में जारी नए बिल में पेबल अमाउंट ₹40,669 बताया गया है, जिसमें वही विवादित बिल जोड़कर पूरे भुगतान का दबाव उपभोक्ता पर डाला जा रहा है। यह आर्थिक बोझ तो है ही, इसके साथ प्रशासनिक उपेक्षा ने मानसिक पीड़ा को कई गुना बढ़ा दिया है।

शिकायत निवारण प्रणाली की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। उपभोक्ता ने 1912 पर अब तक चार शिकायतें दर्ज कराई—MV04112503836, MV17112506896, MV29112501406 और सबसे हाल की MV06122509253। लेकिन पहले तीन शिकायतों को बिना किसी वास्तविक कार्रवाई के “आपकी समस्या का समाधान कर दिया गया” कहकर बंद कर दिया गया। एक महीने से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी विभाग की ओर से न तो जांच हुई, न समाधान। मजबूर होकर जब वह स्वयं अलीगंज उपकेंद्र पहुंचे तो वहां के एक कर्मचारी ने बेहिस्सी भरी टिप्पणी की—“बाउजी, हम लोग कान से सुन तो सकते हैं… कर कुछ नहीं सकते।” यह टिप्पणी सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि विभाग की कार्यशैली और उपभोक्ता के प्रति रवैये का आइना है।

मोहल्ले के लोग भी इस घटना पर नाराज़ हैं। उनका कहना है कि यदि पेंशन पर निर्भर एक बुजुर्ग उपभोक्ता के साथ इस तरह का व्यवहार हो सकता है तो आम जनता की स्थिति का अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं। स्मार्ट मीटर लगाए जाने के बाद समस्याएँ बढ़ी हैं, पारदर्शिता कम हुई है और शिकायतों के निस्तारण के नाम पर सिर्फ औपचारिकताएँ पूरी की जा रही हैं। जब मीटर बदलने के समय रिकॉर्ड गलत भरा गया, रीडिंग ‘00’ लिखी गई, मीटर नंबर मेल नहीं खाते और तारीख तक दर्ज नहीं की गई—तो यह पूरी व्यवस्था की गंभीर खामी को उजागर करता है।

यह मामला केवल एक उपभोक्ता की समस्या नहीं, बल्कि स्मार्ट मीटरिंग प्रणाली की विश्वसनीयता पर उठता हुआ बड़ा सवाल है। विभाग से उम्मीद की जाती है कि वह न सिर्फ गलत बिल की जांच कर सही बिल जारी करे, बल्कि मीटर बदलने की प्रक्रिया में हुई गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों पर कार्रवाई भी सुनिश्चित करे। क्योंकि अगर ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज किया गया, तो स्मार्ट मीटर व्यवस्था की साख ही नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं का विश्वास भी टूट जाएगा।

रजनीकांत उपाध्याय कहते हैं कि यदि विभाग ने जल्द समाधान नहीं किया, तो वे मुख्यमंत्री हेल्पलाइन, IGRS पोर्टल और उपभोक्ता फोरम तक जाने को मजबूर होंगे। सवाल अब भी वही है—विभाग कब जागेगा? एक वयोवृद्ध उपभोक्ता न्याय की उम्मीद में दर-दर भटक रहे हैं और प्रशासनिक तंत्र अभी भी नींद में डूबा हुआ है।

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