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1.34 करोड़ की पेनाल्टी, फायर एनओसी नहीं, नक्शा स्वीकृत नहीं — सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद क्या कार्रवाई के घेरे में आएगा पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम का प्रबंध निदेशक कार्यालय?

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1.34 करोड़ की पेनाल्टी, फायर एनओसी नहीं, नक्शा स्वीकृत नहीं — सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद क्या कार्रवाई के घेरे में आएगा पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम का प्रबंध निदेशक कार्यालय?

अवैध निर्माणों पर सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट संदेश— "अनधिकृत निर्माण ध्वस्त होना चाहिए", अब वाराणसी स्थित पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम मुख्यालय पर उठे गंभीर सवाल

अविजित आनंद, दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। दिल्ली के मालवीय नगर में हुए भीषण अग्निकांड में 21 लोगों की दर्दनाक मौत के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशभर में हाईराइज भवनों, होटलों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और सरकारी कार्यालयों की फायर सेफ्टी तथा निर्माण संबंधी अनुमतियों की व्यापक जांच के निर्देश दिए हैं। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में स्थित पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (पीवीवीएनएल) के प्रबंध निदेशक कार्यालय से जुड़ा मामला प्रशासनिक व्यवस्था और कानून के समान अनुपालन पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।

उपलब्ध अभिलेखों, आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों और विभागीय पत्राचार के अनुसार वाराणसी विकास प्राधिकरण ने पीवीवीएनएल के प्रबंध निदेशक कार्यालय भवन पर स्वीकृत मानचित्र न होने के कारण लगभग 1.33 करोड़ रुपये की पेनाल्टी निर्धारित की थी, जो ब्याज सहित लगभग 1.34 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। जानकारी के अनुसार उक्त धनराशि अब तक जमा नहीं की गई है। यदि यह तथ्य सही है तो यह मामला केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि भवन निर्माण नियमों के अनुपालन से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।

इस पूरे प्रकरण को सार्वजनिक विमर्श तक पहुंचाने में दैनिक इंडिया न्यूज़ द्वारा किए गए दस्तावेजी अध्ययन, आरटीआई के माध्यम से जुटाए गए अभिलेखों और निरंतर पड़ताल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उपलब्ध रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि मामले की गंभीरता के बावजूद जांच प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे बढ़ती दिखाई नहीं दे रही।

मामले का सबसे संवेदनशील पहलू फायर सेफ्टी से जुड़ा हुआ है। मुख्य अग्निशमन अधिकारी, वाराणसी द्वारा आरटीआई के तहत दिए गए लिखित उत्तर में स्पष्ट कहा गया है कि संबंधित भवन को अग्निशमन विभाग द्वारा अग्नि अनापत्ति प्रमाण पत्र (फायर एनओसी) जारी नहीं किया गया है। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि प्रतिदिन सैकड़ों अधिकारियों, कर्मचारियों और उपभोक्ताओं की आवाजाही वाले भवन में सुरक्षा मानकों की स्थिति क्या है और यदि किसी अप्रिय घटना की स्थिति उत्पन्न होती है तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी।

इस बीच 30 अप्रैल 2025 को सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने अवैध निर्माणों पर ऐतिहासिक और अत्यंत कठोर टिप्पणी करते हुए स्पष्ट कहा कि अनधिकृत निर्माणों के प्रति किसी प्रकार की नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि बिना वैध अनुमतियों के खड़े किए गए निर्माणों को नियमित करने की प्रवृत्ति कानून के शासन के विपरीत है तथा आवश्यकता पड़ने पर ऐसे निर्माणों को ध्वस्त किया जाना चाहिए। न्यायालय ने राज्यों, विकास प्राधिकरणों और स्थानीय निकायों को भी निर्देश दिया कि वे नियमों के उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करें तथा दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करें।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि पूर्णता प्रमाणपत्र अथवा अधिभोग प्रमाणपत्र के बिना आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने, अनधिकृत भवनों को संचालन की अनुमति देने अथवा नियमों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई और अवमानना की कार्यवाही तक की जा सकती है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का उल्लंघन करने वाले निर्माणों को बाद में नियमित करने की प्रवृत्ति न्यायिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं मानी जा सकती।

यहीं से पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के प्रबंध निदेशक कार्यालय का मामला और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। उपलब्ध दस्तावेजों से यह आरोप सामने आता है कि भवन निर्माण के बाद मानचित्र स्वीकृत कराने का प्रयास किया गया। यदि सक्षम जांच में यह तथ्य प्रमाणित होता है तो मामला सीधे निर्माण नियमों के अनुपालन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ जाएगा।

विधान परिषद सदस्य आशुतोष सिन्हा द्वारा भी यह मामला सदन में उठाया जा चुका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार निगम की ओर से लिखित उत्तर में कहा गया था कि भवन के लिए नक्शा बनवाने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि सार्वजनिक अभिलेखों और अन्य दस्तावेजों के आधार पर इस उत्तर पर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इतने गंभीर आरोपों और दस्तावेजी विवादों के बावजूद अब तक कोई स्पष्ट प्रशासनिक निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवैध निर्माणों पर निर्धारित कठोर मानकों का अनुपालन सरकारी विभागों और उनके शीर्ष कार्यालयों पर भी समान रूप से किया जाएगा? यदि निजी भवनों, होटलों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के विरुद्ध नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई होती है, तो क्या वही कसौटी सरकारी संस्थानों पर भी लागू होगी?

जनता के बीच कई महत्वपूर्ण प्रश्न चर्चा का विषय बने हुए हैं—

  • क्या 1.34 करोड़ रुपये की पेनाल्टी की वसूली सुनिश्चित की जाएगी?
  • क्या फायर एनओसी और मानचित्र स्वीकृति से जुड़े तथ्यों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
  • क्या स्टेट विजिलेंस जांच को समयबद्ध तरीके से पूरा कर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
  • यदि अनियमितताएं सिद्ध होती हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी या नहीं?
  • क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के फायर सेफ्टी निरीक्षण संबंधी निर्देश इस भवन पर भी समान कठोरता से लागू किए जाएंगे?
  • और सबसे महत्वपूर्ण, क्या सर्वोच्च न्यायालय की हालिया व्यवस्था के आलोक में इस भवन की वैधानिक स्थिति की पुनः समीक्षा की जाएगी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में स्थित इस भवन से जुड़े प्रश्न अब केवल एक विभागीय विवाद नहीं रह गए हैं। यह मामला कानून के समान अनुपालन, प्रशासनिक पारदर्शिता, सार्वजनिक सुरक्षा और जवाबदेही की उस कसौटी पर खड़ा दिखाई देता है, जिस पर आज पूरा देश अपने संस्थानों को परख रहा है। अब देखना यह है कि संबंधित प्राधिकरण, राज्य सरकार और जांच एजेंसियां इस प्रकरण में आगे क्या कदम उठाती हैं।

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