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43 कंपनियों के कर्ज में ₹3.53 लाख करोड़ का अंतर

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Dainik India News

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43 कंपनियों के कर्ज में ₹3.53 लाख करोड़ का अंतर

₹5.44 लाख करोड़ के बकाये में ₹1.90 लाख करोड़ की वसूली का दावा; डीएचएफएल, रिलायंस इन्फ्राटेल और लैंको थर्मल समेत कई बड़े खातों में भारी अंतर—कर्ज समाधान की प्रक्रिया पर दस्तावेजी पड़ताल जरूरी

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली।बैंकों की ऋण-पुस्तिकाओं में दर्ज 43 कंपनियों से संबंधित आंकड़े सामने आने के बाद देश की वित्तीय व्यवस्था में बड़े कॉरपोरेट ऋणों के निस्तारण को लेकर एक गंभीर प्रश्न उभरता है। सार्वजनिक किए गए विवरण के अनुसार इन कंपनियों पर कुल ₹5,44,434 करोड़ का बकाया था, जिसके मुकाबले ₹1,90,779 करोड़ की वसूली बताई गई और लगभग ₹3,53,655 करोड़ का अंतर ‘हेयरकट’ के रूप में सामने आया। यह आंकड़ा 8 अगस्त 2024 को राज्यसभा में सांसद संजय सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया था। सिंह ने सदन में कहा था कि आंकड़े उन्हें सरकारी स्रोतों से प्राप्त हुए हैं। इसलिए इस रिपोर्ट में कंपनीवार आंकड़ों को उसी सार्वजनिक दावे के संदर्भ में रखा जा रहा है, न कि केंद्र सरकार द्वारा जारी स्वतंत्र कंपनीवार आंकड़े के रूप में। लेकिन इन संख्याओं के सामने आते ही अगला प्रश्न स्वयं रास्ता बना लेता है—इतनी बड़ी धनराशि और उसके निस्तारण की प्रक्रिया आखिर थी क्या?

‘हेयरकट’ शब्द सुनने में जितना साधारण प्रतीत होता है, वित्तीय और दिवाला समाधान की शब्दावली में उसका अर्थ उतना ही विशिष्ट है। किसी ऋणदाता का कुल स्वीकृत अथवा दावा किया गया ऋण यदि समाधान प्रक्रिया में उससे कम राशि पर निस्तारित होता है, तो मूल दावे और प्राप्त अथवा स्वीकार की गई राशि के मध्य का अंतर हेयरकट कहलाता है। इसका अर्थ यह आवश्यक रूप से नहीं कि सरकार ने उतनी राशि प्रत्यक्ष रूप से माफ कर दी। यही वह बिंदु है जहां ऋण-माफी, तकनीकी राइट-ऑफ, समझौता निस्तारण और दिवाला समाधान जैसी अलग-अलग वित्तीय अवधारणाएं एक-दूसरे से पृथक दिखाई देती हैं। और इन्हीं के बीच छिपा है इस पूरे आंकड़े का वास्तविक अर्थ।

कंपनीवार विवरण पर नजर डालें तो सबसे बड़ा आंकड़ा Dewan Housing Finance Corporation (DHFL) से जुड़ा दिखाई देता है। इसके मामले में ₹87,083 करोड़ के बकाये के मुकाबले ₹37,161 करोड़ की वसूली और ₹49,922 करोड़ के अंतर का उल्लेख है। अर्थात उपलब्ध विवरण के अनुसार मूल दावे और प्राप्त राशि के बीच लगभग पचास हजार करोड़ रुपये का फासला रहा। लेकिन यह केवल एक कंपनी का मामला नहीं है; अगली कंपनियों के आंकड़े इस तस्वीर को और व्यापक बनाते हैं।

Bhushan Steel के संबंध में ₹56,022 करोड़ के बकाये के मुकाबले ₹35,571 करोड़ की वसूली और ₹20,451 करोड़ के अंतर का विवरण दिया गया है। Bhushan Power & Steel के ₹47,158 करोड़ के बकाये के विरुद्ध ₹19,350 करोड़ की वसूली तथा ₹27,808 करोड़ के अंतर का उल्लेख है। वहीं Essar Steel India के ₹49,473 करोड़ के बकाये में ₹41,018 करोड़ की वसूली बताई गई है, जिससे ₹8,455 करोड़ का अंतर निकलता है। यहां प्रश्न केवल यह नहीं कि कितनी राशि वापस आई; प्रश्न यह है कि ऋणदाताओं ने उपलब्ध विकल्पों में से किसे स्वीकार किया और उस निर्णय के पीछे परिसंपत्ति-मूल्यांकन, वसूली की संभावना तथा समाधान योजना का कौन-सा वित्तीय आकलन था।

इसी क्रम में Reliance Infratel का आंकड़ा विशेष ध्यान आकर्षित करता है। सार्वजनिक विवरण में कंपनी का बकाया ₹41,055 करोड़ और वसूली ₹4,236 करोड़ बताई गई है। दोनों के बीच ₹36,819 करोड़ का अंतर दर्ज है। इससे भी अधिक तीखा अंतर Lanco Thermal Power के मामले में दिखाई देता है, जहां ₹33,331 करोड़ के बकाये के मुकाबले केवल ₹136 करोड़ की वसूली बताई गई है और अंतर ₹33,195 करोड़ दर्ज है। वित्तीय दृष्टि से ये आंकड़े उस कठिन प्रश्न की ओर संकेत करते हैं कि कुछ मामलों में ऋणदाताओं की वसूली क्षमता इतनी सीमित क्यों रही कि मूल दावे की तुलना में स्वीकार्य राशि अत्यंत कम रह गई।

Alok Industries के मामले में ₹29,524 करोड़ के बकाये के मुकाबले ₹5,052 करोड़ की वसूली और ₹24,472 करोड़ का अंतर बताया गया है। Essar Power MP के ₹12,068 करोड़ के बकाये में ₹2,500 करोड़ की वसूली तथा ₹9,568 करोड़ का अंतर है। Monnet Ispat & Energy के ₹11,015 करोड़ के बकाये के मुकाबले ₹2,852 करोड़ की वसूली और ₹8,123 करोड़ का अंतर बताया गया है। इन संख्याओं को अलग-अलग देखने पर वे किसी एक कंपनी की वित्तीय कठिनाई जैसी प्रतीत हो सकती हैं, लेकिन जब यही पैटर्न अनेक बड़े ऋण खातों में दिखाई देता है तो विषय व्यक्तिगत कंपनियों से आगे बढ़कर क्रेडिट-अंडरराइटिंग, जोखिम-मूल्यांकन और ऋण-वसूली की संस्थागत संरचना का प्रश्न बन जाता है।

सूची में Jet Airways India के संबंध में ₹7,454 करोड़ के बकाये के मुकाबले ₹1,010 करोड़ की वसूली और ₹6,444 करोड़ के अंतर का उल्लेख है। Deccan Chronicle Holdings के मामले में ₹8,181 करोड़ के बकाये के विरुद्ध केवल ₹358 करोड़ की वसूली और ₹7,823 करोड़ का अंतर बताया गया है। MTK Auto के लिए ₹12,641 करोड़ का बकाया और ₹2,615 करोड़ की वसूली, जबकि Electrosteel Steels के लिए ₹13,175 करोड़ के बकाये के मुकाबले ₹5,320 करोड़ की वसूली का विवरण दिया गया है। प्रत्येक आंकड़ा अपने भीतर एक अलग ऋण-समाधान कथा समेटे है, लेकिन इन सभी को एक साथ रखने पर सवाल कहीं अधिक गंभीर हो जाता है।

यहीं यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ₹3,53,655 करोड़ के कथित हेयरकट को सीधे ‘केंद्र सरकार द्वारा 43 कंपनियों का ₹3.53 लाख करोड़ कर्ज माफ कर दिया गया’ कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता के अंतर्गत समाधान प्रक्रिया में वित्तीय लेनदारों की समिति किसी प्रस्तावित resolution plan पर विचार करती है और वसूली की संभाव्यता, परिसंपत्तियों के मूल्य तथा उपलब्ध वैकल्पिक विकल्पों को देखते हुए कम राशि स्वीकार कर सकती है। इसलिए मूल दावे और प्राप्त राशि का अंतर अपने आप में सरकारी ऋण-माफी का प्रमाण नहीं है। इस अंतर को समझे बिना पूरे प्रकरण का निष्कर्ष निकालना वित्तीय शब्दावली के साथ न्याय नहीं होगा।

फिर भी इससे मूल प्रश्न समाप्त नहीं होता, बल्कि और अधिक पैना हो जाता है। यदि किसी खाते में हजारों करोड़ रुपये का दावा था और समाधान के बाद उसका एक सीमित अंश ही प्राप्त हुआ, तो ऋणदाताओं ने उस समाधान को आर्थिक रूप से बेहतर विकल्प क्यों माना? क्या परिसंपत्तियों का मूल्यांकन उतना ही था जितना समाधान योजना में माना गया? क्या संभावित परिसमापन से मिलने वाली राशि इससे भी कम होती? क्या समाधान योजना के क्रियान्वयन के बाद अतिरिक्त वसूली की कोई संभावना बनी? और क्या संबंधित बैंकों के लेखांकन में इन राशियों का उपचार एक समान रहा?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल राजनीतिक वक्तव्यों से नहीं मिलेगा। इसके लिए प्रत्येक कंपनी के admitted claims, financial creditors, resolution plan, liquidation value, resolution value, वास्तविक प्राप्ति, बैंकों के लेखांकन और ऋण खाते के अंतिम निस्तारण का दस्तावेजी परीक्षण आवश्यक होगा। यही वह दस्तावेजी श्रृंखला है जो बताएगी कि सार्वजनिक चर्चा में दिखाई दे रहा ₹3.53 लाख करोड़ का अंतर वास्तव में किन वित्तीय प्रक्रियाओं का परिणाम है।

इस प्रकरण में एक और सावधानी आवश्यक है। सार्वजनिक किए गए कंपनीवार आंकड़ों और उनके कुल योग के बीच कुछ गणितीय विसंगतियां भी दिखाई देती हैं। इसलिए प्रकाशित सूची को अंतिम सरकारी प्रमाण-पत्र मान लेने के बजाय मूल बैंकिंग और दिवाला दस्तावेजों से उसका मिलान किया जाना जरूरी है। इतने बड़े वित्तीय परिमाण में एक छोटी गणनात्मक त्रुटि भी समग्र निष्कर्ष को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए फिलहाल सबसे तथ्यपरक निष्कर्ष यही है कि 43 कंपनियों से जुड़े बड़े ऋण खातों में ₹5.44 लाख करोड़ के बकाये, लगभग ₹1.90 लाख करोड़ की बताई गई वसूली और ₹3.53 लाख करोड़ के कथित हेयरकट का एक सार्वजनिक दावा मौजूद है। इस दावे का स्रोत-संदर्भ राज्यसभा में प्रस्तुत विवरण और उसके आधार पर जारी कंपनीवार सूची है; इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित केंद्र सरकार की कंपनीवार रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

लेकिन यदि इन आंकड़ों की मूल बैंकिंग फाइलों से पुष्टि होती है, तो बहस का केंद्र केवल यह नहीं रहेगा कि कितने करोड़ रुपये का ‘हेयरकट’ हुआ। तब असली प्रश्न यह होगा कि इतने बड़े ऋणों का प्रारंभिक जोखिम-मूल्यांकन कैसे हुआ, ऋणदाता संस्थाओं ने वसूली के कौन-कौन से विकल्प अपनाए और अंततः सार्वजनिक धन के रूप में उपलब्ध बैंकिंग पूंजी का कितना अंश वापस वित्तीय तंत्र में लौट सका।

अब सवाल आम जनता से है—अगर ₹5.44 लाख करोड़ के बकाये में से करीब ₹1.90 लाख करोड़ की ही वसूली का दावा है, तो शेष राशि के निस्तारण को आप किस नजरिए से देखते हैं? क्या बड़े ऋणों के समाधान की प्रक्रिया पर्याप्त पारदर्शी है? अपनी राय नीचे टिप्पणी में जरूर लिखें।

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