Brindavan Bottlers और Rockwood Hotels के कंसोर्टियम को दीर्घकालीन लीज; अखिलेश यादव के सवालों के बीच जनता पूछ रही—सरकारी पैसे से बनी संपत्ति का संचालन निजी हाथों में क्यों?
दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। गोमतीनगर की प्राइम लोकेशन पर खड़ा जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर यानी JPNIC इन दिनों फिर सुर्खियों में है। वजह सिर्फ यह नहीं कि करीब नौ साल बाद इसके दरवाजे खुलने की उम्मीद जगी है। असली चर्चा उस फैसले की है, जिसके तहत जनता के पैसे से बनी इस विशाल संपत्ति के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी अब निजी कंसोर्टियम को दी गई है। परियोजना पर सरकारी खजाने से करीब 821 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और अब अधूरे काम पूरे करने के लिए निजी पक्ष को करीब 200–250 करोड़ रुपये और लगाने होंगे।
यहीं से पहला सवाल सामने आता है—जब JPNIC सरकारी धन से बना है तो सरकार इसे स्वयं क्यों नहीं चला सकती? और यदि निजी संचालन ही इसका समाधान था, तो करीब नौ वर्षों तक यह विकल्प क्यों नहीं अपनाया गया? सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं। क्या यह महज प्रशासनिक संयोग है या वर्षों से बंद पड़ी राजधानी की इस बड़ी परियोजना को चुनाव से पहले सक्रिय करने की रणनीति? इसका निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन सवाल उठना स्वाभाविक है।
JPNIC की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। परियोजना की शुरुआती लागत करीब 200 करोड़ रुपये बताई गई थी, जो बढ़ते-बढ़ते लगभग 821 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। 2017 के बाद निर्माण और परियोजना को लेकर विवाद बढ़े और परिसर लंबे समय तक उपयोग से बाहर रहा। अब वही संपत्ति नए मॉडल के साथ आगे बढ़ रही है। सवाल फिर वही—200 करोड़ की परियोजना 821 करोड़ तक कैसे पहुंची और इतना खर्च होने के बावजूद यह वर्षों तक अधूरी क्यों रही?
अब इस कहानी में दो कंपनियों के नाम महत्वपूर्ण हैं—Brindavan Bottlers Private Limited और Rockwood Hotels & Resorts। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दोनों का कंसोर्टियम JPNIC के संचालन के लिए चयनित हुआ है। LDA के अनुसार वैश्विक निविदा में तीन bidders शामिल हुए थे और चयनित कंसोर्टियम की बोली सबसे अधिक रही।
Brindavan Bottlers का मुख्य कारोबारी परिचय बॉटलिंग और beverage manufacturing से जुड़ा है। दूसरी ओर Rockwood Hotels & Resorts के पास hospitality क्षेत्र में अनुभव होने की जानकारी सामने आती है। इसलिए सवाल यह नहीं कि कंपनियां “अनुभवहीन” हैं या नहीं; असली सवाल यह है कि JPNIC जैसे होटल, कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम, खेल सुविधाओं और पार्किंग वाले विशाल परिसर के लिए consortium की तकनीकी और वित्तीय क्षमता को किस कसौटी पर परखा गया?
सरकार का पक्ष भी स्पष्ट है। संपत्ति बेची नहीं जा रही; स्वामित्व LDA के पास रहेगा। निजी consortium अधूरे कार्यों पर निवेश करेगा और संचालन करेगा। रिपोर्टों के अनुसार LDA को प्रारंभिक भुगतान के साथ performance guarantee और संचालन शुरू होने के बाद वार्षिक भुगतान भी मिलेगा।
लेकिन विपक्ष इसे अलग नजरिए से देख रहा है। अखिलेश यादव ने सरकार पर सार्वजनिक संपत्तियों को निजी हाथों में देने का आरोप लगाते हुए तीखा हमला किया है। उनके लिए यह उनके कार्यकाल की महत्वाकांक्षी परियोजना है, जबकि सरकार के लिए वर्षों से निष्क्रिय पड़ी संपत्ति को बिना अतिरिक्त सरकारी बोझ के पुनर्जीवित करने का मॉडल।
अब असली फैसला राजनीतिक बयान नहीं, दस्तावेज करेंगे। जनता जानना चाहेगी—निविदा में शामिल तीन bidders कौन थे? तकनीकी मूल्यांकन में किसे कितने अंक मिले? चयनित consortium की भूमिका और निवेश की शर्तें क्या हैं? 30 वर्ष की लीज में निजी संचालक को मिलने वाले व्यावसायिक अधिकारों और LDA को होने वाली आय का पूरा गणित क्या है?
JPNIC की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सवाल किसी एक सरकार या एक दल का नहीं—सवाल उस सार्वजनिक संपत्ति का है जिस पर जनता का पैसा लगा है।
अब फैसला जनता करे—
क्या निजी संचालन JPNIC को नौ साल के सन्नाटे से बाहर निकालने का सही रास्ता है? या सरकारी पैसे से बनी इतनी बड़ी संपत्ति सरकार को स्वयं संचालित करनी चाहिए थी? और चुनाव से कुछ महीने पहले लिया गया यह फैसला—महज संयोग है या जनता को इस पर और सवाल पूछने चाहिए?
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