10 नामों पर बनी सहमति के बाद सूची टाइप होने से पहले चली कैंची; महेंद्र सिंह, श्रीकांत शर्मा समेत कई चर्चित चेहरे रह गए बाहर—आठ पदाधिकारियों में अवध की मजबूत मौजूदगी, कानपुर और ब्रज क्षेत्र को नहीं मिला प्रतिनिधित्व
दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ/नई दिल्ली। भाजपा की राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश से आठ चेहरों को स्थान मिलने के बावजूद संगठन के भीतर अंतिम क्षण तक चली कवायद ने कई दावेदारों की उम्मीदों को झटका दे दिया। पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर प्रदेश से 10 नामों पर सहमति बनने की चर्चा थी, लेकिन सूची अंतिम रूप लेकर टाइप होने से पहले ही दो नामों पर कैंची चल गई। इसके साथ ही राष्ट्रीय संगठन में जगह पाने की दौड़ में शामिल कई प्रमुख चेहरों के राजनीतिक भविष्य और संगठनात्मक भूमिका को लेकर भी नई अटकलें तेज हो गई हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व जलशक्ति मंत्री और संगठनात्मक रणनीति के लिए चर्चित महेंद्र सिंह का नाम इस पूरी कवायद में सबसे अधिक चर्चा में रहा। माना जा रहा था कि क्षत्रिय प्रतिनिधित्व के समीकरण को बनाए रखते हुए उन्हें अरुण सिंह के स्थान पर राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी दी जा सकती है। कई राज्यों के प्रभारी के रूप में काम कर चुके महेंद्र सिंह का संगठन में लंबा अनुभव उनकी दावेदारी को मजबूत करता था, लेकिन अंतिम सूची में उनका नाम नहीं आया। यही बदलाव राष्ट्रीय टीम के गठन में अंतिम समय तक चले मंथन की ओर संकेत करता है।
मथुरा से विधायक और प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री श्रीकांत शर्मा की राष्ट्रीय टीम में वापसी की संभावना भी प्रबल मानी जा रही थी। वह पहले राष्ट्रीय संगठन का हिस्सा रह चुके हैं और इस बार उनके पुनः राष्ट्रीय भूमिका में आने की चर्चा थी। इसके बावजूद उन्हें जगह नहीं मिली। किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार चाहर का नाम भी राष्ट्रीय मंत्री के संभावित दावेदारों में शामिल बताया जा रहा था, लेकिन उनकी दावेदारी भी अंतिम सूची तक नहीं पहुंच सकी।
राष्ट्रीय संगठन में दूसरी पारी की प्रतीक्षा कर रहे नेताओं की सूची यहीं समाप्त नहीं होती। 2023 में जेपी नड्डा की टीम में राष्ट्रीय मंत्री बनाए गए गुर्जर चेहरे सुरेंद्र नागर को इस बार पदोन्नत किए जाने की चर्चा थी, लेकिन उन्हें भी दोबारा अवसर नहीं मिला। मेरठ की पूर्व राज्यसभा सदस्य कांता कर्दम दलित प्रतिनिधित्व के आधार पर राष्ट्रीय संगठन में दावेदारी जता रही थीं, मगर उन्हें प्रदेश और राष्ट्रीय—दोनों स्तरों पर कोई पद नहीं मिल सका। इसी क्रम में जुलाई 2023 में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए मेरठ के लक्ष्मीकांत वाजपेयी भी दूसरी पारी पाने में असफल रहे।
प्रतापगढ़ के पूर्व सांसद संगमलाल गुप्ता का नाम भी अंतिम क्षण तक चर्चा में बना रहा। वहीं दलित समाज से विद्यासागर सोनकर और विनोद सोनकर की दावेदारी भी परवान नहीं चढ़ सकी। विधान परिषद सदस्य अशोक कटारिया, अश्विनी त्यागी और गोविंद नारायण शुक्ला के नाम भी राष्ट्रीय टीम को लेकर संगठनात्मक चर्चाओं में रहे, लेकिन अंतिम संरचना में उन्हें स्थान नहीं मिला। इस तरह उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय पदाधिकारियों के चयन ने संभावित नामों और वास्तविक सूची के बीच अंतर को स्पष्ट कर दिया है।
इससे पहले सितंबर 2020 में जेपी नड्डा की राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश के 11 चेहरों को स्थान मिला था, जबकि जुलाई 2023 में गठित टीम में प्रदेश से छह नेताओं को राष्ट्रीय जिम्मेदारी मिली थी। इस बार आठ पदाधिकारियों को जगह मिलने से संख्या के स्तर पर उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी बढ़ी है, लेकिन क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का संतुलन पूरी तरह एकसमान नहीं दिखाई देता।
क्षेत्रवार तस्वीर देखें तो इस बार अवध क्षेत्र की पकड़ सबसे मजबूत नजर आती है। राष्ट्रीय महामंत्री हरीश द्विवेदी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेखा वर्मा और ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष अमरपाल मौर्य इसी क्षेत्र से आते हैं। अमेठी से राजनीतिक जुड़ाव के कारण स्मृति ईरानी को काशी क्षेत्र के प्रतिनिधित्व के रूप में देखा जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बुलंदशहर के सांसद भोला सिंह को राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी मिली है, जबकि बासित अली को अल्पसंख्यक मोर्चे में स्थान मिला है। गोरखपुर क्षेत्र से राज्यसभा सदस्य संगीता यादव राष्ट्रीय टीम में पहुंची हैं।
सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि ब्रज और कानपुर क्षेत्र इस बार राष्ट्रीय टीम में प्रतिनिधित्व से वंचित रह गए। ऐसे में उत्तर प्रदेश की राष्ट्रीय संगठन में बढ़ी संख्या के साथ-साथ क्षेत्रीय संतुलन का सवाल भी राजनीतिक और संगठनात्मक विमर्श का हिस्सा बन गया है। अंतिम क्षण में बदले गए नामों ने यह भी दिखाया है कि भाजपा की राष्ट्रीय टीम के गठन में केवल व्यक्तिगत दावेदारी ही नहीं, बल्कि सामाजिक, क्षेत्रीय और संगठनात्मक समीकरणों का अंतिम क्षण तक गहन परीक्षण किया गया।