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गुरुसत्ता के प्रति अहर्निश निष्ठा : ब्रह्मविद्या, ऋतंभरा प्रज्ञा और विवेक का सनातन रहस्य

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Dainik India News

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गुरुसत्ता के प्रति अहर्निश निष्ठा : ब्रह्मविद्या, ऋतंभरा प्रज्ञा और विवेक का सनातन रहस्य


युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के गुरु-दर्शन एवं गुरुगीता के आलोक में

"तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।"

— मुंडकोपनिषद् (1.2.12)

भारतीय अध्यात्म की समस्त साधना-परम्परा यदि किसी एक सूत्र में पिरोई जा सकती है, तो वह है—गुरुसत्ता के प्रति अहर्निश निष्ठा। यह निष्ठा किसी व्यक्तित्व-विशेष के प्रति आसक्ति का नाम नहीं, न ही किसी बाह्य अनुष्ठान का पर्याय है। वेदान्त के आलोक में यह उस परम चैतन्य के प्रति आत्मसमर्पण है, जो सद्गुरु के माध्यम से साधक के अन्तःकरण में अवतरित होकर उसे आत्मबोध की दिशा प्रदान करता है। युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने समस्त वाङ्मय में गुरु को चमत्कारों का प्रदर्शक नहीं, बल्कि मानव के भीतर सुप्त देवत्व का जागरण कराने वाली ब्रह्मचेतना कहा है। उनके चिंतन में गुरु का महत्त्व इसलिए नहीं है कि वे पूजनीय हैं, बल्कि इसलिए कि वे आत्मपरिवर्तन के दिव्य विज्ञान के जीवंत प्रतिनिधि हैं। यहीं से गुरु-निष्ठा का वास्तविक अर्थ उद्घाटित होता है।

वेदान्त का प्रथम उद्घोष यह है कि आत्मा स्वभावतः पूर्ण है; अपूर्णता केवल अज्ञान की अनुभूति है। यदि आत्मा स्वयं ब्रह्मस्वरूप है, तो फिर साधना का प्रयोजन क्या है? यही प्रश्न प्रत्येक जिज्ञासु के मन में उठता है। उपनिषद् इस जिज्ञासा का उत्तर देते हैं कि सत्य का अस्तित्व तो सदैव था, किन्तु अज्ञान का आवरण उसे अनुभव नहीं होने देता। सद्गुरु उसी आवरण को हटाने वाले दिव्य आलोक हैं। इसलिए गुरु कोई नया सत्य प्रदान नहीं करते; वे उस सत्य का स्मरण कराते हैं जो शिष्य के अस्तित्व में अनादिकाल से प्रतिष्ठित है। युगऋषि ने इसी तथ्य को बार-बार रेखांकित करते हुए कहा कि सच्चा गुरु वह है जो शिष्य को स्वयं अपने भीतर उतरना सिखा दे।

यहीं से एक अत्यन्त सूक्ष्म भेद स्पष्ट होता है। संसार में शिक्षक ज्ञान देता है, किन्तु सद्गुरु ज्ञान का अनुभव कराता है। शिक्षक सूचना का विस्तार करता है, गुरु चेतना का विस्तार करते हैं। शिक्षक स्मृति को समृद्ध करता है, गुरु अन्तःकरण को निर्मल बनाते हैं। इसीलिए भारतीय संस्कृति में गुरु को केवल विद्वान नहीं कहा गया, बल्कि 'ब्रह्मनिष्ठ' कहा गया है। ब्रह्मनिष्ठ वह है जिसने सत्य को पढ़ा नहीं, जिया है; जिसने शास्त्रों का अर्थ केवल समझा नहीं, अपने प्राणों में उतारा है। ऐसे गुरु के प्रति निष्ठा व्यक्ति-पूजा नहीं, सत्य के प्रति निष्ठा है।

युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने गुरु-दर्शन में स्पष्ट किया है कि गुरु की खोज बाहर से पहले भीतर प्रारम्भ होती है। जिस साधक के भीतर सत्य के लिए व्याकुलता, आत्मपरिष्कार की उत्कंठा और लोकमंगल के लिए समर्पण नहीं जागता, वह लाखों गुरु बदल ले, फिर भी वास्तविक गुरुकृपा का अधिकारी नहीं बन सकता। उन्होंने गुरु-भक्ति को भावुकता नहीं, बल्कि जीवन-साधना का अनुशासन माना। उनके अनुसार गुरु का सम्मान पुष्पमालाओं से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करके किया जाता है। गुरु के प्रति श्रद्धा तभी सार्थक है जब वह चरित्र में उतरकर जीवन की दिशा बदल दे।

यही कारण है कि भगवद्गीता का वचन—"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्"—साधारण धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि चेतना-विज्ञान का सार्वकालिक सिद्धान्त है। श्रद्धा यहाँ अन्धविश्वास नहीं है; श्रद्धा वह आन्तरिक निर्मलता है जिसके कारण साधक सत्य को ग्रहण करने योग्य बनता है। संशयग्रस्त मन तर्क तो कर सकता है, किन्तु सत्य का अनुभव नहीं कर सकता। जब श्रद्धा निष्ठा में रूपान्तरित होती है, तब गुरु का प्रत्येक वचन केवल सुनाई नहीं देता, अपितु अन्तःकरण में अंकुरित होने लगता है। यही अंकुर आगे चलकर प्रज्ञा के रूप में विकसित होता है।

युगऋषि के सम्पूर्ण साहित्य में प्रज्ञा शब्द का अत्यन्त विशिष्ट महत्त्व है। उन्होंने मनुष्य को 'प्रज्ञा का पुत्र' बनने का आह्वान किया। सामान्य बुद्धि परिस्थितियों का विश्लेषण करती है, किन्तु प्रज्ञा परिस्थितियों के पीछे कार्यरत दिव्य नियमों का बोध कराती है। बुद्धि लाभ-हानि का विचार करती है; प्रज्ञा धर्म-अधर्म का निर्णय करती है। बुद्धि व्यक्ति को सफल बना सकती है, किन्तु प्रज्ञा उसे महान बनाती है। यही कारण है कि आचार्यश्री ने प्रज्ञा को केवल बौद्धिक उत्कर्ष नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण का प्रथम चरण माना। गुरु-निष्ठा के अभाव में बुद्धि कुशाग्र हो सकती है, किन्तु प्रज्ञा का उदय नहीं होता।

किन्तु वेदान्त यहीं रुकता नहीं। वह पूछता है—क्या प्रज्ञा ही अंतिम उपलब्धि है? पतञ्जलि योगसूत्र इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं—"ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा।" अर्थात् जब चित्त पूर्ण निर्मल हो जाता है, तब उसमें ऐसी प्रज्ञा का उदय होता है जो केवल सत्य को धारण करती है। युगऋषि ने भी अपने साधना-दर्शन में बार-बार कहा कि साधना का उद्देश्य जानकारी बढ़ाना नहीं, बल्कि अन्तःकरण को इतना निर्मल बना देना है कि सत्य स्वयं उसमें प्रतिबिम्बित होने लगे। जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण में सूर्य का प्रकाश स्वतः प्रतिबिम्बित होता है, उसी प्रकार निर्मल अन्तःकरण में ब्रह्मचेतना का प्रकाश स्वतः प्रकट होता है। यही ऋतंभरा प्रज्ञा का वास्तविक स्वरूप है।

परन्तु प्रश्न फिर भी शेष रहता है—यदि प्रज्ञा और ऋतंभरा प्रज्ञा का उदय हो गया, तो मनुष्य के व्यवहार में उसका प्रमाण क्या होगा? यहीं वेदान्त विवेक की चर्चा करता है। विवेक केवल तर्कशक्ति नहीं है; यह अस्तित्व की सूक्ष्मतम परतों को पहचानने की क्षमता है। युगऋषि ने विवेक को आत्मा का प्रहरी कहा है। जब तक विवेक जागृत नहीं होता, तब तक साधना भी अहंकार का कारण बन सकती है। इसलिए गुरु पहले ज्ञान नहीं देते, वे विवेक जगाते हैं। विवेक जागते ही मनुष्य स्वयं अपने दोषों को देखने लगता है; और यही आत्मदर्शन, आत्मनिर्माण का प्रारम्भ बन जाता है।

यहीं से गुरु-निष्ठा का वास्तविक स्वरूप अधिक स्पष्ट होने लगता है। गुरु का अर्थ किसी के व्यक्तित्व का अनुकरण करना नहीं, बल्कि उसके द्वारा इंगित सत्य को अपने जीवन में उतारना है। युगऋषि ने अनेक स्थानों पर लिखा कि गुरु का अनुग्रह तभी प्राप्त होता है जब शिष्य स्वयं अपने जीवन को तप, संयम, सेवा और साधना का पात्र बनाता है। गुरुकृपा कोई आकस्मिक चमत्कार नहीं; वह आत्मपरिष्कार का स्वाभाविक परिणाम है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सब पर समान रूप से पड़ता है, किन्तु स्वच्छ दर्पण ही उसे पूर्णतः प्रतिबिम्बित कर पाता है, उसी प्रकार गुरुकृपा सर्वत्र उपलब्ध है, पर उसका पूर्ण अवतरण उसी अन्तःकरण में होता है जो श्रद्धा, निष्ठा और पवित्रता से परिपूर्ण हो।

यहीं से गुरुगीता का वह अप्रतिम आध्यात्मिक आयाम उद्घाटित होता है, जिसे भारतीय साधना का प्राण कहा गया है। स्कन्दपुराण के उत्तरखण्ड में भगवान सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं कि गुरु कोई बाह्य सत्ता नहीं, अपितु ब्रह्म के प्रत्यक्ष अनुभव का माध्यम हैं। गुरुगीता का उद्देश्य किसी मनुष्य का महिमामण्डन नहीं, बल्कि उस गुरुतत्त्व का निरूपण है जो अज्ञान से ज्ञान, सीमित से असीम और जीवभाव से शिवभाव तक की यात्रा का सेतु बनता है। इसीलिए गुरुगीता बार-बार साधक को बाह्य उपासना से अधिक अन्तःकरण की निर्मलता, समर्पण और आज्ञापालन का उपदेश देती है। गुरुसत्ता के प्रति अहर्निश निष्ठा का तात्पर्य यही है कि साधक का सम्पूर्ण व्यक्तित्व सत्य के अनुशासन में ढल जाए।

युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने गुरु-दर्शन में इसी सत्य को आधुनिक भाषा में प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट किया कि गुरु का वास्तविक स्वरूप किसी चमत्कार, अलौकिक प्रदर्शन अथवा भाग्यवाद का पोषण नहीं करता। गुरु शिष्य को परावलम्बी नहीं बनाते, बल्कि आत्मावलम्बी बनाते हैं। वे व्यक्ति की दुर्बलताओं का बोझ अपने ऊपर नहीं लेते; वे उसके भीतर ऐसी प्रज्ञा का संचार करते हैं कि वह स्वयं अपने दोषों का परिमार्जन करने लगे। इसीलिए आचार्यश्री ने बार-बार कहा कि गुरुकृपा का सर्वोच्च प्रमाण बाह्य उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि अन्तःकरण का परिष्कार है। जहाँ स्वभाव में विनम्रता, व्यवहार में करुणा, विचारों में पवित्रता और कर्म में लोकमंगल का समावेश होने लगे, वहीं समझना चाहिए कि गुरु का अनुग्रह हृदय में अवतरित हो चुका है।

वेदान्त यह भी स्पष्ट करता है कि आत्मा और परमात्मा के मध्य जो दूरी प्रतीत होती है, वह वस्तुतः अज्ञान की दूरी है, अस्तित्व की नहीं। जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार तक सीमित मानता है, तब तक संसार के आकर्षण, भय, मोह और द्वेष उसके जीवन को संचालित करते रहते हैं। किन्तु जैसे ही गुरु की दीक्षा केवल मन्त्र तक सीमित न रहकर जीवन-दृष्टि का रूप धारण कर लेती है, साधक के भीतर एक मौन क्रान्ति प्रारम्भ होती है। वह संसार से भागता नहीं, अपितु संसार के मध्य रहते हुए भी उससे आसक्त नहीं रहता। यही स्थिति वेदान्त में स्थितप्रज्ञता और आचार्यश्री के साहित्य में देवमानव निर्माण का आधार मानी गई है।

गुरुगीता के प्रसिद्ध वचन—"ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः, पूजामूलं गुरोः पदम्, मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरोः कृपा।"—का आशय केवल उपासना-विधि बताना नहीं है। इसका दार्शनिक संकेत यह है कि साधक का ध्यान गुरु के व्यक्तित्व पर नहीं, गुरु द्वारा प्रकाशित आदर्शों पर केन्द्रित हो; उसकी पूजा केवल चरण-वन्दन तक सीमित न रहे, बल्कि उन चरणों से निर्दिष्ट मार्ग पर चलने में परिणत हो; गुरुवचन केवल श्रवण का विषय न बने, बल्कि जीवन का संविधान बन जाए। जब यह साधना परिपक्व होती है, तब गुरुकृपा स्वतः मोक्ष का कारण बनती है।

युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने समग्र जीवन से यह प्रतिपादित किया कि गुरु-भक्ति का सर्वोच्च रूप सेवा, साधना और स्वाध्याय का त्रिवेणी-संगम है। उन्होंने बार-बार कहा कि जो व्यक्ति अपने दोषों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं, वह गुरु के समीप रहकर भी दूर है; और जो व्यक्ति सत्य, तप, संयम तथा लोकसेवा के मार्ग पर चलने का साहस करता है, वह दूर रहकर भी गुरुसत्ता से जुड़ा हुआ है। इसीलिए उन्होंने गुरु को किसी संप्रदाय की सीमाओं में नहीं, बल्कि विश्वमानव के नैतिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष का केन्द्र माना।

स्कन्दपुराण में गुरु-महिमा का वर्णन करते हुए यह भाव प्रकट होता है कि असंख्य यज्ञ, तप, व्रत और तीर्थ भी उस अन्तःशुद्धि की बराबरी नहीं कर सकते, जो सद्गुरु की निष्काम सेवा और अखण्ड श्रद्धा से प्राप्त होती है। इसका तात्पर्य बाह्य कर्मों का निषेध नहीं, बल्कि यह है कि यदि कर्मों के पीछे अन्तःकरण की पवित्रता नहीं है, तो वे अधूरे हैं। गुरु उसी पवित्रता के जागरण का नाम है। वे शिष्य के भीतर सुप्त ब्रह्मतेज को जाग्रत करते हैं और उसे आत्मकेन्द्रित जीवन से उठाकर लोकमंगल की विराट चेतना से जोड़ देते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में गुरु को केवल उपदेशक नहीं, बल्कि संस्कार-शिल्पी कहा गया है।

वेदान्त का चरम निष्कर्ष यह है कि ज्ञान का सर्वोच्च प्रमाण वाणी नहीं, जीवन है। यदि साधना के वर्षों बाद भी मनुष्य क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, लोभ और संकीर्णता से मुक्त नहीं हुआ, तो उसका अध्ययन केवल बौद्धिक संग्रह है। किन्तु यदि उसके व्यवहार में समत्व, क्षमा, दया, सत्यनिष्ठा और आत्मसंयम प्रकट होने लगे, तो समझना चाहिए कि गुरुसत्ता का प्रकाश उसके अन्तःकरण में प्रतिष्ठित हो चुका है। युगऋषि ने इसी सत्य को आत्मनिर्माण, परिवार-निर्माण और समाज-निर्माण की अखण्ड साधना का आधार बनाया। उनके लिए अध्यात्म पलायन नहीं, बल्कि चरित्र का उत्कर्ष था; उपासना कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का रूपान्तरण थी।

जब साधक का सम्पूर्ण जीवन गुरुतत्त्व के अनुशासन में ढल जाता है, तब उसके भीतर प्रज्ञा केवल विचार नहीं रहती, ऋतंभरा प्रज्ञा केवल योगशास्त्र की अवधारणा नहीं रहती और विवेक केवल नैतिक शिक्षा नहीं रह जाता। ये तीनों उसके व्यक्तित्व के स्वाभाविक गुण बन जाते हैं। तब वह सत्य को पढ़ता नहीं, सत्य को जीता है; धर्म का प्रचार नहीं करता, स्वयं धर्म का स्वरूप बन जाता है। यही गुरु-निष्ठा का परम उत्कर्ष है।

अन्ततः यह समझ लेना चाहिए कि गुरुसत्ता के प्रति अहर्निश निष्ठा किसी व्यक्ति-विशेष के प्रति अन्धसमर्पण नहीं, बल्कि सत्य, तप, करुणा, आत्मसंयम और ब्रह्मविद्या के प्रति आजीवन प्रतिबद्धता का नाम है। यही वेदान्त का हृदय है, यही गुरुगीता का मर्म है और यही युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के गुरु-दर्शन का प्राणतत्त्व है। जिस दिन मनुष्य अपने भीतर स्थित देवत्व को जाग्रत करने का संकल्प लेकर गुरु द्वारा प्रदत्त आदर्शों को जीवन का आधार बना लेता है, उसी दिन से उसकी साधना प्रारम्भ नहीं होती—वह स्वयं साधना का सजीव स्वरूप बन जाता है। तभी गुरुकृपा अनुभूति में परिवर्तित होती है, अनुभूति ब्रह्मविद्या में, ब्रह्मविद्या ऋतंभरा प्रज्ञा में और ऋतंभरा प्रज्ञा अन्ततः उस परम शान्ति में, जिसे उपनिषद् "सच्चिदानन्द" कहकर सम्बोधित करते हैं। यही गुरु-निष्ठा का सनातन रहस्य है, यही ऋषि-परम्परा की अमर धरोहर है और यही मानव जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ।

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