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“प्रीपेड खत्म…पर समस्या कायम: ‘स्मार्ट मीटर’ या उपभोक्ता के साथ तकनीकी अन्याय?”

“जनाक्रोश के आगे झुका सिस्टम, मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद भी धुंध साफ नहीं—क्या यह सुधार है या संगठित भूल की लीपापोती?”

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Dainik India News

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“प्रीपेड खत्म…पर समस्या कायम: ‘स्मार्ट मीटर’ या उपभोक्ता के साथ तकनीकी अन्याय?”



दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया है, वह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि शासन, तकनीक और जवाबदेही—तीनों की विश्वसनीयता की कठोर परीक्षा बन चुका है। ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा द्वारा यह घोषणा कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर व्यवस्था समाप्त कर अब इन्हें पोस्टपेड की तरह संचालित किया जाएगा, पहली नजर में राहत अवश्य देती है। किंतु सवाल यहीं से शुरू होता है—क्या यह निर्णय उस गहरी संरचनात्मक विफलता का समाधान है, जिसने लाखों उपभोक्ताओं को आर्थिक और मानसिक संकट में झोंक दिया?

प्रदेश के 77 लाख से अधिक घरों में लगाए गए स्मार्ट मीटरों को कभी पारदर्शिता और डिजिटल क्रांति का प्रतीक बताया गया था, लेकिन वास्तविकता इसके ठीक विपरीत सामने आई। उपभोक्ताओं ने 80 से 85 प्रतिशत तक बढ़े हुए बिजली बिलों, भुगतान के बावजूद कनेक्शन बहाल न होने और तकनीकी गड़बड़ियों की लगातार शिकायत की। यह isolated घटना नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर फैला वह संकट है जिसने इस पूरी योजना की विश्वसनीयता को संदिग्ध बना दिया।

जनता और मीडिया की लगातार उठती आवाजों ने जब विकराल रूप लिया, तब जाकर सत्ता के शीर्ष को हस्तक्षेप करना पड़ा। यह स्पष्ट संकेत है कि व्यवस्था स्वयं से नहीं, बल्कि दबाव में झुकती नजर आई। किंतु विडंबना यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हस्तक्षेप के बाद भी जमीनी स्तर पर पारदर्शिता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। विभाग ने प्रीपेड से पोस्टपेड में स्विच करने की बात तो कही, लेकिन मूल समस्या—मीटरों की कार्यप्रणाली और उनकी विश्वसनीयता—अब भी जस की तस बनी हुई है।

यहां सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि क्या केवल भुगतान प्रणाली बदल देने से समस्या समाप्त हो जाएगी? जिन मीटरों पर “तेज भागने”, गलत रीडिंग देने और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने के आरोप लगे हैं, वही मीटर यदि पोस्टपेड मोड में भी चलते रहे, तो क्या यह सुनिश्चित है कि बिलिंग में गड़बड़ी नहीं होगी? या फिर यह केवल एक प्रशासनिक भ्रम पैदा करने का प्रयास है?

तकनीकी स्तर पर भी यह पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में है। मल्टीपल डेटा मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म (MDM) और हेड एंड सिस्टम (HES) के जटिल नेटवर्क के बीच समन्वय की कमी ने उपभोक्ताओं को राहत देने के बजाय और अधिक भ्रमित किया है। जब तकनीक सुविधा देने के बजाय संकट पैदा करे, तो उसे “स्मार्ट” नहीं, बल्कि “सिस्टमेटिक फेल्योर” कहना अधिक उचित होगा।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब तक मीटरों की गुणवत्ता और निष्पक्षता पर कोई व्यापक, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच नहीं कराई गई। जिन पर अधिक बिलिंग और निम्न गुणवत्ता के आरोप हैं, उनके लिए न तो थर्ड-पार्टी ऑडिट की स्पष्ट समयसीमा दी गई है और न ही यह बताया गया है कि जिन उपभोक्ताओं से अतिरिक्त वसूली हुई, उसकी भरपाई कैसे होगी।

और इस पूरे प्रकरण का सबसे असहज सत्य यह है कि यदि जनता और मीडिया ने समय रहते आवाज न उठाई होती, तो शायद यह निर्णय भी नहीं लिया जाता। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति का दर्पण है—जहां व्यवस्था तब तक मौन रहती है, जब तक जनाक्रोश उसे झकझोर न दे।

विडंबना और भी गहरी तब प्रतीत होती है, जब एक ओर योगी आदित्यनाथ की छवि देशभर में एक सख्त और निर्णायक प्रशासक के रूप में स्थापित है—जहां अन्य राज्यों में भी उनके नेतृत्व की मांग उठती है—वहीं दूसरी ओर उनके ही प्रदेश में कुछ विभागीय तंत्र जनता के विश्वास को ठेस पहुंचाते नजर आते हैं। यह विरोधाभास केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर मौजूद गंभीर खामियों की ओर संकेत करता है।

आज आवश्यकता केवल प्रीपेड से पोस्टपेड में बदलाव की नहीं, बल्कि पूरे स्मार्ट मीटर सिस्टम की सर्जिकल ऑडिट, तकनीकी शुद्धता की पुष्टि और जिम्मेदारी तय करने की है। जब तक यह नहीं होता, तब तक यह पूरी कवायद सुधार नहीं, बल्कि समस्या को नए रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास ही मानी जाएगी।

अंततः प्रश्न सीधा और असहज है—

क्या सरकार समस्या की जड़ तक पहुंचकर ठोस समाधान देगी, या फिर सतही निर्णयों के जरिए जनता को एक और अधूरे प्रयोग का हिस्सा बनाती रहेगी?

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