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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पवित्र है परन्तु उसकी पवित्रता को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी हम सब पर है : सतीश महाना

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पवित्र है परन्तु उसकी पवित्रता को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी हम सब पर है : सतीश महाना

दैनिक इंडिया न्यूज लखनऊ। पूरब का ऑक्सफोर्ड यानी भारत का ”डेट्राइट” कहे जाने वाला पुणे शहर में गुरुवार को उ. प्र. विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना एम.आई.टी. वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी कैंपस के स्वामी विवेकानंद मंडप में भारतीय छात्र संसद फाउंडेशन और एम.आई.टी. स्कूल ऑफ गवर्नमेंट (पुणे) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति हुए और छात्रों को सम्बोधित भी किया।

अभिव्यक्ति की स्वतंतत्रा लोकतान्त्रिक जीवन का अभिन्न अंग है : सतीश महाना

महाना ने अपने संबोधन में कहा कि मुझे उ.प्र. विधानसभा के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनकी हार्दिक इच्छा थी कि वह छात्र संसद में शामिल हों। उन्हें आज यह अवसर मिला है। इसे लेकर वह बेहद उत्साहित हैं। अपने संबोधन में सतीश महाना ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश में, प्रदेश में, समाज में यहां तक कि अपने परिवार में भी होती है। इसके विभिन्न आयाम भी होने के साथ-साथ एक लक्ष्मण रेखा भी अनिवार्य होना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में इस संवैधानिक अधिकार का दुरूपयोग कदापि नहीं होना चाहिए। महाना ने संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंतत्रा के अधिकार को मानव अधिकार की संज्ञा देते हुए कहा कि यह लोकतान्त्रिक जीवन का अभिन्न अंग है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रक्षा का दायित्व हम सभी का है

विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता का दुरूपयोग न हो इस तरफ हम सभी को विशेष ध्यान रखने की जरूरत है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पवित्र है परन्तु उसकी पवित्रता को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी हम सब पर है। महाना ने उपस्थिति छात्रों से कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में हमें इस बात का पूरा ख्याल रखना चाहिए कि सामाजिक समरसता और सौहार्द बिगड़ने न पाए।

महाना ने आगे कहा कि अक्सर देखा गया है कि राजनीति के क्षेत्र से जुडे़ लोगों के प्रति हमारे समाज में जो वर्षों से एक नेगेटिव धारणा बनी हुई है उसे अब बदलने की जरूरत हैं। समय के साथ चलना बहुत ही जरूरी है।

उन्होंने कहा कि हमारे समाज में लोगों का यह भी मानना है कि इस (राजनीति के) क्षेत्र में अधिकतर लोग पढे़-लिखे नहीं होते हैं। यहां तक कि राजनीति के क्षेत्र में आने वाले लोगों को पॉजिटिव व्यू/दृष्टि से नहीं देखा जाता है। परंतु कुछ वर्षों से इस तरह की धारणा में बदलाव आया है। लेकिन मुझे इस बात की खुशी भी है कि नई पीढ़ी अपनी जिम्मेदारियों को भली-भांति समझते हुए समाज में फैली इस गलत धारणा को बदलने का काम भी कर रही है।

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