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अर्थ जगत की पड़ताल: घाटे से कमाई का ज़ोमैटो मॉडल—कैसे निवेशकों ने 'घाटा' बेचा और मुनाफ़ा कमा लिया

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Dainik India News

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अर्थ जगत की पड़ताल: घाटे से कमाई का ज़ोमैटो मॉडल—कैसे निवेशकों ने 'घाटा' बेचा और मुनाफ़ा कमा लिया

डॉ. विवेक | दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।शेयर बाजार में अगर किसी कहानी ने हाल के वर्षों में सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा है, तो वो है ज़ोमैटो की। एक ऐसा स्टार्टअप जिसने 2018 से 2021 के बीच ₹4,600 करोड़ का घाटा उठाया, लेकिन फिर भी निवेशकों की नकदी की बारिश थमी नहीं। ग्राहक को छूट, कर्मचारियों को आकर्षक वेतन और संस्थापकों को करोड़ों की तनख्वाह—सब कुछ चलता रहा।

संस्थापक का मूल वेतन ₹3.50 करोड़, सह-संस्थापक का ₹3.70 करोड़, सीटीओ को ₹1.50 करोड़ और सीएफओ को ₹3.26 करोड़ वेतन मिला। लेकिन आयकर? शून्य। कारण था कंपनी का भारी घाटा। सवाल यह है—इस घाटे का भार कौन उठा रहा था? जवाब है—बाहरी निवेशक।

घाटा किसका, खेल किसका?

ज़ोमैटो के शीर्ष पांच निवेशकों के पास लगभग 50% हिस्सेदारी थी। उन्होंने जानबूझकर घाटे में चल रही कंपनी में निवेश किया, क्योंकि उन्हें मुनाफा कंपनी की बैलेंस शीट में नहीं, बल्कि इसके मूल्यांकन में दिख रहा था। उन्होंने कंपनी को ₹60,000 करोड़ का मूल्यांकन दिलवाया—बिना किसी वास्तविक लाभ के।

यह मूल्यांकन बना IPO (इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग) का सुनहरा टिकट। ज़ोमैटो का IPO ₹116 प्रति शेयर की कीमत पर लॉन्च हुआ, जो 38% से ज़्यादा सब्सक्राइब हुआ। मीडिया, सोशल मीडिया और बाजार विशेषज्ञों की मदद से ऐसा माहौल बना दिया गया मानो यह IPO मिस करना एक बहुत बड़ी चूक होगी।

IPO का खेल: प्रचार जनता को, पैसा निवेशकों को

IPO के ज़रिए ज़ोमैटो ने ₹9,400 करोड़ जुटाए। लेकिन इसमें से केवल ₹400 करोड़ कंपनी के पास गए। शेष ₹9,000 करोड़ सीधे उन शुरुआती निवेशकों की जेब में पहुंच गए, जिन्होंने घाटे के दौर में इस स्टार्टअप को फंड किया था।

यानी जनता ने उस घाटे को खरीदा, जिसे पहले निवेशकों ने प्रचार के जरिए मूल्य में बदला। उन्होंने ₹4,700 करोड़ के घाटे को 60x से 1010x रिटर्न के एग्जिट में बदल डाला। और अब, आम निवेशक—पब्लिक शेयरधारक—हाथ में वह बैग पकड़े हैं जिसमें सिर्फ घाटा है।

यह है आज का नया बाजार तंत्र

यह कहानी सिर्फ ज़ोमैटो की नहीं, बल्कि उस नई अर्थव्यवस्था की है जहां घाटा भी बिकता है—अगर प्रचार सही हो, और अगर मूल्यांकन के मायाजाल में निवेशक फंस जाएं। यहां असली कमाई बैलेंस शीट पर नहीं, बल्कि शेयरों की कीमत और मार्केट हाइप पर होती है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि स्टार्टअप संस्कृति में घाटा अब कमजोरी नहीं, बल्कि अवसर बन चुका है—बशर्ते उसके पीछे निवेशकों की रणनीति और प्रचार की शक्ति हो।

शेयर बाजार में यह एक नई परिभाषा है—"Loss is the new Profit."

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