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गुरु-तत्त्व : साधक से द्रष्टा तक

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गुरु-तत्त्व : साधक से द्रष्टा तक

हरेंद्र सिंह दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ।सनातन परंपरा में साधना का अंतिम लक्ष्य केवल आत्मानुभूति नहीं, दृष्टि-परिवर्तन है। साधक वह है जो मार्ग पर चलता है, किंतु द्रष्टा वह है जो मार्ग को देख सकता है। यह रूपांतरण स्वतः नहीं होता; यह गुरु-तत्त्व की परिपक्व कृपा से घटित होता है। गुरु साधक को कर्म देता है, पर द्रष्टा उसे बोध देता है।


साधक का जीवन प्रयासप्रधान होता है—जप, नियम, अनुशासन, व्रत। पर द्रष्टा का जीवन साक्षीभाव में प्रतिष्ठित होता है। यहाँ गुरु की भूमिका निर्णायक हो जाती है, क्योंकि गुरु ही वह तत्त्व है जो साधना के अरण्य में भटकते साधक को यह दिखा देता है कि मार्ग तुम नहीं हो, मार्ग को देखने वाला हो। यही गुरु-तत्त्व का सूक्ष्मतम उपकार है।


गुरु-गीता में इस अवस्था का संकेत अत्यंत गंभीर शब्दों में किया गया है—
“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।”
यहाँ गुरु केवल प्रकाश देने वाला नहीं, बल्कि दृष्टि खोलने वाला है। प्रकाश बहुतों के पास होता है, किंतु देखने की क्षमता नहीं। गुरु साधक को वस्तुओं से नहीं, दृष्टि से परिचित कराता है। और जहाँ दृष्टि बदल जाती है, वहाँ संसार वही रहकर भी नया हो जाता है।
स्कंद पुराण में गुरु को ‘द्रष्टा-निर्माता’ कहा गया है—अर्थात वह जो शिष्य को घटनाओं का भोक्ता नहीं रहने देता, बल्कि अर्थ का साक्षी बना देता है। साधक जब तक जीवन को सहता है, वह साधक ही रहता है; किंतु जब वह जीवन को समझने लगता है, तब वह द्रष्टा बनने लगता है। यह समझ बौद्धिक नहीं होती, यह गुरु-तत्त्व से संप्रेषित मौन बोध होती है।


द्रष्टा बनने का अर्थ संसार से विमुख होना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए उससे बंधनमुक्त होना है। गुरु यहाँ साधक को यह नहीं सिखाता कि क्या करना है, बल्कि यह दिखाता है कि जो हो रहा है, उसे कैसे देखना है। यही कारण है कि गुरु-तत्त्व कर्म का निषेध नहीं करता, वह कर्म को दर्शन में रूपांतरित करता है।


पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने इसी अवस्था को ‘जीवनमुक्त चेतना’ कहा था—जहाँ व्यक्ति कार्य करता है, पर कर्ता नहीं बनता। यह अवस्था गुरु-तत्त्व के बिना संभव नहीं, क्योंकि अहंकार स्वयं को देखने की क्षमता नहीं रखता। गुरु वह दर्पण है, जिसमें साधक स्वयं को पहली बार निर्मल रूप में देख पाता है।
साधक और द्रष्टा के मध्य का यह सेतु अत्यंत सूक्ष्म है। साधक प्रश्न करता है—मैं क्या करूँ?
द्रष्टा प्रश्न करता है—मैं कौन हूँ?
और गुरु-तत्त्व वह शक्ति है जो साधक को उत्तर नहीं देता, बल्कि उसे उस बिंदु तक ले जाता है जहाँ प्रश्न स्वयं विलीन हो जाता है।
गुरु-तत्त्व का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है जब व्यक्ति परिस्थिति से नहीं, दृष्टि से संचालित होने लगता है। प्रशासन हो या समाज, धर्म हो या राष्ट्र—जहाँ द्रष्टा उपस्थित होता है, वहाँ प्रतिक्रिया नहीं, विवेक जन्म लेता है।
द्रष्टा होना अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व की पराकाष्ठा है। क्योंकि जो देख सकता है, वह अनदेखा नहीं कर सकता। गुरु-तत्त्व साधक को इसी स्तर तक उठाता है—जहाँ वह केवल अपने लिए नहीं, समष्टि के लिए देखने लगता है। यही वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति का जीवन स्वयं एक शास्त्र बन जाता है—बिना बोले, बिना उपदेश दिए।
अतः गुरु-तत्त्व का चरम लक्ष्य साधक पैदा करना नहीं, द्रष्टा गढ़ना है। ऐसा द्रष्टा जो संसार से भागता नहीं, संसार को समझता है; जो विरोध नहीं करता, विवेक जगाता है; और जो स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों के लिए प्रकाश-पथ बन जाता है।
यही गुरुसत्ता की पूर्णता है—
जहाँ साधना समाप्त नहीं होती,
बल्कि दर्शन में परिवर्तित हो जाती है।

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