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राम के आदर्शों को जीवन में उतारना ही रामराज्य की स्थापना का मार्ग – जितेन्द्र प्रताप सिंह

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Dainik India News

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राम के आदर्शों को जीवन में उतारना ही रामराज्य की स्थापना का मार्ग – जितेन्द्र प्रताप सिंह

दैनिक इंडिया न्यूज़ नई दिल्ली, विजयदशमी विशेष।
विजयदशमी के पावन अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं संस्कृत भारती न्यास, अवध प्रांत के अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह ने राष्ट्रहित की मंगलकामनाओं के साथ देशवासियों को संबोधित किया। उन्होंने विधि-विधान से पूजा-पाठ कर माँ दुर्गा और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का स्मरण किया और विजयदशमी के ऐतिहासिक संदेश को आज के भारत के लिए मार्गदर्शक बताया।

जितेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि “विजयदशमी केवल रावण वध की स्मृति भर नहीं है, बल्कि यह उस आदर्श की प्रेरणा है, जिसमें असत्य पर सत्य और अन्याय पर न्याय की विजय सुनिश्चित होती है।” उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि आज के समय में लोग रामचरितमानस पढ़ते तो हैं, लेकिन उसके गूढ़ संदेश और श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात नहीं करते।

उन्होंने आगे कहा कि श्रीराम केवल एक महानायक नहीं थे, बल्कि वे ‘आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श राजा और आदर्श मानव’ के प्रतीक हैं। उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग समाज को यह सिखाता है कि धर्म और सत्य का पालन करते हुए कठिन से कठिन परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि हम सचमुच रामराज्य की परिकल्पना को साकार करना चाहते हैं, तो हमें केवल रामायण का पाठ करने से अधिक, राम के आदर्शों को अपने व्यवहार और जीवनचर्या में अपनाना होगा। “रामराज्य केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि एक जीवन मूल्य है। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति मर्यादा और धर्म को अपने आचरण का आधार बनाएगा, तभी रामराज्य वास्तविक रूप से स्थापित हो सकेगा।”

अपने संबोधन में श्री सिंह ने यह भी कहा कि विजयदशमी हमें स्मरण कराती है कि चाहे अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों न लगे, अंततः पराजय उसका ही निश्चित है। आज के युग में समाज में फैले भ्रष्टाचार, हिंसा, असत्य और विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ आधुनिक रावण का रूप हैं। इन्हें पराजित करने के लिए प्रत्येक नागरिक को राम के आदर्शों को धारण करना होगा।

उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा कि “हम सबको अपने भीतर के रावण को पहचानना होगा। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन से अहंकार, क्रोध, लोभ और असत्य को त्याग देगा, तभी समाज में रामराज्य की स्थापना होगी। यह कार्य किसी एक संगठन या व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का सामूहिक संकल्प है।”

कार्यक्रम के अंत में जितेन्द्र प्रताप सिंह ने सभी देशवासियों को विजयदशमी की मंगलकामनाएँ देते हुए यह संदेश दिया कि भारत की समृद्धि, एकता और सांस्कृतिक वैभव का मार्ग केवल श्रीराम के आदर्शों को अपनाने में निहित है।

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