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“संगीत व्यक्ति को ही नहीं, समाज को भी जोड़ता है” — संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह

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“संगीत व्यक्ति को ही नहीं, समाज को भी जोड़ता है” — संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह

उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की ग्रीष्मकालीन कार्यशालाओं का हुआ भव्य समापन,

75 जिलों में फैला कला का उत्सव

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ, 1 जुलाई।
“संगीत केवल आत्मा की साधना नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली शक्ति है। यह व्यक्ति के भीतर के एकाकीपन को दूर करता है और सामूहिक चेतना को जगाता है।” — यह उद्गार उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री जयवीर सिंह ने व्यक्त किए।
वे आज उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित ग्रीष्मकालीन प्रस्तुतिपरक कार्यशालाओं के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे, जो लखनऊ के संत गाडगे जी प्रेक्षागृह, गोमतीनगर स्थित अकादमी परिसर में आयोजित हुआ।

कार्यक्रम में 5 वर्ष से लेकर 75 वर्ष तक के कलाकारों की विविध प्रस्तुतियाँ आकर्षण का केंद्र रहीं। माननीय मंत्री ने बताया कि इस वर्ष प्रदेश के 75 जनपदों में आयोजित इन कार्यशालाओं में कुल 19,000 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें से केवल लखनऊ में 300 से अधिक प्रतिभागियों ने अपनी उपस्थिति और प्रतिभा से मंच को गौरवान्वित किया।

उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में भी उत्तर प्रदेश का संस्कृति विभाग पारंपरिक नृत्य, गायन एवं लोककलाओं के माध्यम से लोगों को जोड़ने का कार्य कर रहा है। पंजीकृत कलाकारों को तीन से अधिक प्रस्तुतियाँ देने के लिए शासन की अनुमति अनिवार्य होगी तथा उनकी प्रस्तुतियाँ विभाग की वेबसाइट पर अपलोड की जाएंगी, जिससे पारदर्शिता और प्रामाणिकता बनी रहेगी।

‘विरासत भी, विकास भी’ की ओर ठोस कदम

मंत्री श्री जयवीर सिंह ने बताया कि माननीय प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में प्रदेश में ‘विरासत भी, विकास भी’ की नीति को आगे बढ़ाते हुए सांस्कृतिक विरासतों को संरक्षित व संवर्धित किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि अकादमी द्वारा लुप्तप्राय कलाओं के पुनर्जीवन हेतु गाँवों, पंचायतों, स्कूलों, जेलों, और सामाजिक संगठनों के सहयोग से सारंगी, शहनाई, पखावज, टप्पा, आल्हा-बिरहा, ध्रुपद-धमार जैसी विधाओं पर कार्यशालाओं का आयोजन किया गया।
इस श्रृंखला का अंतिम समापन 14 जुलाई, 2025 को जनपद सम्भल में किया जाएगा।

विशेष रूप से चित्रकूट में कोल जनजाति की बालिकाओं के लिए नाट्य कार्यशाला और वाराणसी में मुखौटा एवं कठपुतली निर्माण कार्यशाला भी आयोजित की गई। लखनऊ की कार्यशालाओं में पांच से 74 वर्ष तक के प्रतिभागियों ने पूरे उत्साह से भाग लेते हुए नृत्य, गायन एवं वादन की प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ दीं।

74 वर्षीय संगीतज्ञ केवल कुमार को विशेष सम्मान

इस अवसर पर मंत्री जी ने 74 वर्षीय वरिष्ठ संगीतज्ञ केवल कुमार के कला समर्पण की विशेष सराहना की। उनकी लोक गायन की प्रस्तुतियाँ ‘भोले बाबा के चरणन मा’, ‘पूरब से आई’, ‘गोरी नयना तोहार रत्नार’ आदि रचनाओं के माध्यम से लोकसंस्कृति को जीवंत किया।

27 मई से 26 जून तक चला कला का उत्सव

अकादमी के अध्यक्ष प्रो. जयंत खोत ने बताया कि इस बार पहली बार अकादमी परिसर में वृहद स्तर पर ग्रीष्मकालीन कार्यशालाएँ आयोजित की गईं। इसमें शास्त्रीय गायन (ख्याल, तराना), उपशास्त्रीय गायन (ठुमरी, दादरा, टप्पा, भजन), कथक नृत्य, अवधी लोकगीत, तबला वादन आदि की विधिवत शिक्षा दी गई।

कार्यक्रम में संस्कृति, पर्यटन व धर्मार्थ कार्य विभाग के प्रमुख सचिव मुकेश मेश्राम, अकादमी के अध्यक्ष प्रो. जयंत खोत, उपाध्यक्ष डॉ विभा सिंह, निदेशक डॉ. शोभित कुमार नाहर, पद्मश्री मालिनी अवस्थी, पर्यटन सलाहकार जे. पी. सिंह सहित कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

संगीत की शाम में रागों का रस और लय की लहर

कार्यक्रम में राहुल अवस्थी के निर्देशन में राग भूपाली में ‘मा नि बरज गाए’, ‘जाऊं तोरे चरण कमल वारी’, और राग बिहाग में ‘गोपाल गोकुल बल्लभी’ की प्रस्तुतियाँ हुईं।
उस्ताद गुलशन भारती के निर्देशन में दादरा ‘झमाझम पानी भरे री’, ठुमरी ‘सांवरिया ने जादू डाला’, टप्पा ‘मैं ता चाल पहचानी’ जैसे मधुर रचनाओं ने दर्शकों की खूब तालियाँ बटोरीं।
डॉ. पवन कुमार के निर्देशन में तबला वादन में तीन ताल, रूपक और कहरवा की लयात्मक प्रस्तुति अत्यंत प्रभावशाली रही।

डॉ. मंजू मलकानी और नीता जोशी के निर्देशन में कथक नृत्य की सशक्त प्रस्तुतियाँ दी गईं। विशेष रूप से दिव्यांग प्रतिभागी की कथक प्रस्तुति ने उपस्थित दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।

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