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सुधार नहीं, स्वीकार का संकल्प — नववर्ष के लिए आध्यात्मिक दृष्टि

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Dainik India News

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सुधार नहीं, स्वीकार का संकल्प — नववर्ष के लिए आध्यात्मिक दृष्टि

दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ।राष्ट्रीय श्रीराम कथा वाचक आचार्य के.के. तिवारी ने अपने उद्बोधन में जीवन को देखने की एक अत्यंत गहन, करुणामयी और यथार्थपरक दृष्टि प्रस्तुत की। उनका स्पष्ट संदेश था—
“हम किसी को सुधारने नहीं आए हैं, हमें स्वीकार करना सीखना होगा।”
उन्होंने कहा कि यह धारणा कि हम किसी अन्य व्यक्ति को “सुधार” सकते हैं, स्वयं में अहंकार का सूक्ष्म रूप है। परमात्मा ने प्रत्येक जीव को उसकी अपनी प्रकृति, स्वभाव और संस्कारों के साथ रचा है। ऐसे में हम कौन होते हैं यह निर्णय करने वाले कि कौन सही है और कौन गलत?
किसी में कमियाँ निकालना सरल है, परंतु उसकी सीमाओं, दुर्बलताओं और भिन्नताओं के साथ उसे स्वीकार करना ही वास्तविक साधना है।


आचार्य तिवारी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वतंत्रता है कि वह स्वयं निर्णय करे कि वह अपने जीवन और अपने नववर्ष को किस प्रकार गढ़ना चाहता है। नववर्ष केवल कैलेंडर बदलने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और नवसंकल्प का क्षण है। उत्सव मनाना चाहिए, परंतु सात्विकता के साथ, विवेक और मर्यादा के भीतर।


उन्होंने जीवन-दृष्टि को स्पष्ट करते हुए कहा—
“खूब जियो, खूब प्रयोग करो, परंतु चेतना के साथ।”
जीवन के प्रयोग यदि धर्म, सत्य और करुणा के आधार पर हों, तो वे साधना बन जाते हैं।
सत्संग के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि कथा और सत्संग अमृत तुल्य हैं—उन्हें केवल सुनना ही नहीं, बल्कि पीना चाहिए। सत्संग का अर्थ मात्र किसी एक स्वरूप का गुणगान सुनना नहीं, बल्कि वह साधना है जिसमें श्रद्धा, आत्मचिंतन और जीवन-परिवर्तन की आकांक्षा निहित हो।
नववर्ष के स्वागत के लिए उन्होंने वैकल्पिक आध्यात्मिक मार्ग सुझाए—
31 दिसंबर की संध्या सुंदरकांड पाठ के साथ भी नववर्ष का स्वागत किया जा सकता है, और मध्यरात्रि में श्रीहनुमान चालीसा के पाठ या यज्ञ द्वारा भी। उनका आग्रह था कि इस बार नववर्ष का आगमन सत्य, प्रेम और करुणा के साथ किया जाए।
उन्होंने चार मूल संकल्पों पर विशेष बल दिया—
सत्य का आचरण — केवल बोलने में नहीं, जीवन में।
स्पष्ट और निर्भय वाणी — परंतु करुणा के साथ।
अहंकार से सावधानी — क्योंकि वही सबसे बड़ा पतन का कारण है।


धर्मग्रंथों का गहन पठन, चिंतन और मनन।
आचार्य तिवारी ने यह भी कहा कि नववर्ष पर प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार अवश्य करना चाहिए कि उसके जीवन में सुख-दुःख, हित-अहित, शुभ-अशुभ, आरोग्य और रोग का वास्तविक कारण क्या है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न तो अतीत और न ही परिस्थितियाँ हमारे सुख-दुःख का मूल कारण हैं—
हमारा स्वभाव, हमारे संस्कार और हमारे कर्म ही इसके लिए उत्तरदायी हैं।


यदि इन मानसिक विकारों और अंतर्द्वंद्वों से मुक्त होना है, तो उन्होंने श्रीहनुमान चालीसा के नियमित पाठ को अत्यंत प्रभावी साधन बताया। मन, वचन और कर्म से किया गया यह पाठ अंतःकरण में शांति, साहस और संतुलन का संचार करता है।
उन्होंने कहा कि यदि अर्धरात्रि के पश्चात भी श्रद्धा और अनुशासन के साथ श्रीहनुमान चालीसा का पाठ किया जाए, तो नववर्ष निश्चय ही मंगलमय, संतुलित और चेतनापूर्ण बनेगा।

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