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<em>हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : सरकारी कर्मचारी को ९० दिनों से ज्यादा सस्पेंड रखना गलत, हाईकोर्ट ने इंस्पेक्टर के सस्पेंशन पर दिया महत्वपूर्ण आदेश</em>

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उल्लाखित है की "सुप्रीम कोर्ट ने प्रावधान दिया है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को उसके खिलाफ आरोप पत्र के अभाव में 90 दिन से अधिक निलंबित नहीं रखा जा सकता क्योंकि ऐसे व्यक्ति को समाज के आक्षेपों और विभाग के उपहास का सामना करना पडता है।"

ऐश्वर्य उपाध्य/दैनिक इंडिया न्यूज लखनऊ

इलाहाबाद हाईकोर्ट का उ. प्र. के सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ा फैसला सामने आया है, जिसके अनुसार किसी भी (सरकारी) कर्मचारी के निलंबित रखने का समय तीन महीने से अधिक का नही होना चाहिए। जिसके उपरांत हाईकोर्ट ने प्रयागराज के थाना हंडिया में तैनात पुलिस इंस्पेक्टर केशव वर्मा के निलंबन पर रोक लगा दी है।

आपको बता दें इंस्पेक्टर केशव वर्मा को इसी साल 11 अप्रैल को उत्तर प्रदेश अधीनस्थ श्रेणी के पुलिस अधिकारियों की (दंड एवं अपील नियमावली) 1991 के नियम 17 (1) (क) के प्रावधानों के अंतर्गत निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद उन्हें प्रयागराज पुलिस लाइन प्रयागराज में अटैच कर दिया गया था।
इस मामले को 3 महीने बीत जाने के बाद भी इंस्पेक्टर केशव वर्मा को कोई भी विभागीय चार्जशीट नहीं दिया गया था, जिसके उपरांत इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंस्पेक्टर केशव वर्मा के निलंबन पर अग्रिम आदेशों तक रोक लगाते हुए प्रयागराज SSP से 4 हफ्ते में जवाब मांगा है।

यह आदेश जस्टिस नीरज तिवारी ने पुलिस इंस्पेक्टर केशव वर्मा की याचिका पर पारित किया है। इस मामले में इंस्पेक्टर केशव वर्मा की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय गौतम व अतिप्रिया गौतम का तर्क था कि निलंबन आदेश नियम एवं कानून के विरुद्ध है। केशव वर्मा को निलंबित करने का आदेश किए 3 महीने से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन विभाग ने अभी तक इंस्पेक्टर केशव वर्मा को कोई विभागीय जांच की चार्जशीट नहीं दी है।

जानें क्या है मामला ?

मामले के अनुसार जब याची बतौर पुलिस इंस्पेक्टर थाना प्रभारी कल्याणपुर, जनपद फतेहपुर में तैनात थे तो उसने प्राथमिकी में नामित अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन, अपहृत युवती की बरामदगी के उन्होंने सार्थक प्रयास नहीं किए। लड़की की बरामदगी न हो पाने पर हाई कोर्ट ने सख्ती दिखाई थी और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर प्रयागराज पुलिस महानिरीक्षक को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से तलब किया था। इस वजह से याची को प्रयागराज (Prayagraj) में तैनाती के दौरान निलंबित कर दिया गया था।

आपको बता दें "पूर्व में इसी प्रकार के निलंबन आदेश पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रक्षा विभाग के संपदा अधिकारी अजय कुमार चौधरी की अपील पर निर्देश दिया था कि निलंबन आदेश तीन महीने से अधिक का नहीं होना चाहिए यदि इस दौरान आरोपी अधिकारी या कर्मचारी को आरोप पत्र नहीं दिया जाता है और यदि आरोप पत्र दिया जाता है तो निलंबन की अवधि बढाने के लिये विस्तृत आदेश दिया जाना चाहिए।"

इस मामले में न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और न्यायमूर्ति सी नागप्पन की खंडपीठ ने रक्षा विभाग के संपदा अधिकारी अजय कुमार चौधरी के प्रकरण में दिए गए निलंबन को विधि व्यवस्था के विरुद्ध एवं निरस्त किए जाने योग्य बताया था। खंडपीठ ने लंबे समय तक सरकारी कर्मचारी को निलंबित रखने की प्रवृत्ति की आलोचना की थी और कहा था कि निलंबन, विशेष रूप से आरोपों के निर्धारण की अवधि में, अस्थाई होता है और इसकी अवधि भी कम होनी चाहिए।

"तब चौधरी को कश्मीर में करीब चार एकड़ भूमि के इस्तेमाल के लिये गलत एन.ओ. सी. प्रमाण पत्र देने के आरोप में 2011 में निलंबित किया गया था। जिस पर फैसला लेते हुए शीर्ष न्यायालय ने कहा था कि इस फैसले के आधार पर यह अधिकारी अपने निलंबन को चुनौती दे सकता है।"

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