दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ ।मानव चेतना के इतिहास में कुछ विचार ऐसे होते हैं जो स्थापित मान्यताओं की जड़ों को हिला देते हैं, और कुछ महापुरुष ऐसे होते हैं जो समाज के पाखंड पर ऐसा प्रहार करते हैं कि युगों तक उसकी प्रतिध्वनि गूँजती रहती है। बीसवीं सदी के सर्वाधिक जाज्वल्यमान और विवादास्पद विचारक आचार्य रजनीश (ओशो) का 'संभोग से समाधि की ओर' कोई कामुक विमर्श नहीं, बल्कि चेतना के ऊर्ध्वगमन का एक अत्यंत गोपनीय और क्रांतिकारी दर्शन है। अधिकांश संसार जिसे केवल वासना का कृत्य मानकर बंद कमरों में छुपाता रहा, ओशो ने उसी 'काम' को परमात्मा के मंदिर की पहली सीढ़ी सिद्ध कर दिया। यह एक ऐसा दर्शन है जो मनुष्य को उसकी आदिम प्रवृत्तियों से भागने के लिए नहीं, बल्कि उनके भीतर डूबकर उनसे पार हो जाने का आमंत्रण देता है। किंतु, कामुकता के इस सघन अंधकार में वह कौन सा ऐसा आध्यात्मिक प्रकाश छिपा है, जिसे जाने बिना मनुष्य का अस्तित्व सदैव अधूरा रह जाता है?
सृष्टि के प्रारंभ से ही मनुष्य ने काम-ऊर्जा को एक अभिशाप, एक पाप या एक त्याज्य वस्तु के रूप में देखा है, जिसके कारण समाज में दमन और विकृति का जन्म हुआ। ओशो इस पाखंड की प्राचीर को अपनी प्रखर मेधा से ढहाते हुए प्रतिपादित करते हैं कि काम-ऊर्जा (लिबिडो) ही वास्तव में जीवन-ऊर्जा (लाइफ-फोर्स) है, जो परमात्मा द्वारा प्रदत्त एकमात्र सृजनात्मक शक्ति है। 'संभोग' के क्षण में मनुष्य अनजाने में ही सही, परंतु कुछ पलों के लिए काल और अहंकार से मुक्त हो जाता है, जहाँ न बीता हुआ कल होता है और न आने वाला कल, केवल एक गहन 'वर्तमान' शेष रह जाता है। वही क्षण, जहाँ विचार शून्य हो जाते हैं और समय ठहर जाता है, मनुष्य को उस अतींद्रिय आनंद की एक अत्यंत सूक्ष्म झलक देता है जिसे समाधि कहा जाता है। परंतु यहाँ एक अत्यंत गहरा रहस्य छिपा है—यदि संभोग में केवल क्षण भर की शांति मिलती है, तो उस शाश्वत, अनंत आनंद को कैसे प्राप्त किया जाए जो मनुष्य को सदा के लिए बुद्धत्व की अवस्था में स्थापित कर दे?
इसी यक्ष प्रश्न के उत्तर में ओशो के इस दर्शन का वह परम गोपनीय और जादुई सूत्र प्रकट होता है, जिसे 'ऊर्ध्वगमन' या ऊर्जा का रूपांतरण कहा जाता है। इस दर्शन का मूल महत्व जैविक कामुकता को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि काम-ऊर्जा के उस प्रवाह को जो सामान्यतः नीचे की ओर (प्रजनन की ओर) बहता है, सजगता और साक्षी-भाव के माध्यम से ऊपर की ओर (चेतना की ओर) मोड़ना है। जब मनुष्य संभोग के क्षणों में केवल शारीरिक लिप्सा में मूर्छित होने के बजाय पूर्णतः होशपूर्ण, विचारशून्य और द्रष्टा बन जाता है, तब वही काम-ऊर्जा मूलाधार चक्र से उठकर सहस्रार चक्र तक की यात्रा तय कर लेती है। यह यात्रा वासना से करुणा की, और क्षुद्र से विराट की ओर गमन है, जहाँ कामुकता विलीन हो जाती है और केवल 'प्रेम' शेष रह जाता है। किंतु, इस परम सत्य को जानते हुए भी आधुनिक समाज और साधक ऐसी कौन सी आत्मघाती भूल कर बैठते हैं, जिसके कारण वे समाधि तो दूर, वासना के दलदल से भी बाहर नहीं निकल पाते?
इस महायात्रा में सबसे बड़ी बाधा और भटकाव तब उत्पन्न होता है, जब साधक इस दर्शन के केवल 'संभोग' वाले पक्ष को पकड़ लेता है और 'सजगता' के मूल तत्व को विस्मृत कर देता है। यदि इस विषय पर एक लोक-कल्याणकारी और सर्वव्यापी लेख तैयार करना हो, तो हमें इसके अश्लील, सतही, और केवल शारीरिक उत्तेजना से जुड़े पहलुओं को पूर्णतः तिलांजलि देनी होगी। हमें समाज को यह समझाना होगा कि ओशो का यह वक्तव्य कामुकता का आमंत्रण नहीं, बल्कि दमन से मुक्ति का मार्ग है, क्योंकि जिस वस्तु का दमन किया जाता है, वह अंतर्मन में और अधिक विकराल रूप धारण कर लेती है। जब हम काम को पाप मानने की ग्लानि से मुक्त होकर उसे एक प्राकृतिक ऊर्जा के रूप में स्वीकार करते हैं, तभी उसे रूपांतरित करने का सामर्थ्य आता है। अंततः, यह दर्शन भर्त्सना से नहीं, बल्कि स्वीकार से शुरू होता है; और जो जीव इस स्वीकार की अग्नि में तपने का साहस दिखाता है, वही उस परम गंतव्य तक पहुँचता है।
यह संपूर्ण दर्शन अंततः एक ऐसे बिंदु पर आकर ठहर जाता है, जहाँ पहुँचकर संसार और संन्यास के बीच की कृत्रिम विभाजक रेखा सदैव के लिए मिट जाती है। संभोग प्रकृति का अंतिम छोर है और समाधि परमात्मा का प्रारंभिक बिंदु; और इन दोनों के बीच का सेतु ही मानव जीवन की सार्थकता है। ओशो का यह क्रांतिकारी विचार मनुष्य को गृहस्थ और त्यागी के द्वंद्व से मुक्त कर एक अत्यंत सहज, समग्र और जीवंत मार्ग प्रदान करता है। अब अंतस की अतल गहराइयों में यह कौतूहल स्वतः जाग्रत होता है कि क्या हम अब भी अपनी ही इस परम सृजनात्मक ऊर्जा को पाखंड के आवरण में छुपाकर आत्म-वंचना करते रहेंगे, या फिर सजगता की नौका पर सवार होकर वासना की इस उफनती नदी को पार कर उस पारमार्थिक समाधि के महासागर में विलीन होने का पुरुषार्थ दिखाएंगे?