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"अंतिम विदाई के आंसू: जब बलिया में फूट-फूटकर रोए थे चंद्रशेखर जी"

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Dainik India News

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"अंतिम विदाई के आंसू: जब बलिया में फूट-फूटकर रोए थे चंद्रशेखर जी"

भावुक स्मृतियों में जीवंत हुए 'दाढ़ी बाबा'

दैनिक इंडिया न्यूज़ ,बलिया, उत्तर प्रदेश।भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष, 'दाढ़ी बाबा' के नाम से लोकप्रिय पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी की आखिरी बलिया यात्रा की स्मृति आज भी उन आंखों में नमी ला देती है, जो उस क्षण के साक्षी बने थे। वरिष्ठ अधिवक्ता वेद प्रकाश द्वारा लिखित यह संस्मरण न केवल एक महान नेता की विदाई का चित्र खींचता है, बल्कि भावनाओं के उस अथाह समंदर में भी ले जाता है, जहाँ नेतृत्व और अपनापन दोनों समान रूप से बहते हैं।

अक्टूबर 2006: जब हर एक आंसू, एक इतिहास बन गया


जेपी जयंती के अवसर पर चंद्रशेखर जी को सिताबदियरा जाना था। ट्रेन से बलिया पहुँचे, और जैसे ही स्वतंत्रता सेनानी बलिया स्टेशन पर लोगों की भीड़ देखी—वो खुद को रोक नहीं पाए। गेट पर आए और लोगों को देख फफक-फफक कर रो पड़े। एक सन्नाटा फैल गया। भीड़ भावविभोर हो गई। ट्रेन सुरेमनपुर पहुँची, फिर वहाँ से कार से सिताबदियरा।

डॉक्टरों की मनाही के बावजूद, पूरे दिन वे अपने लोगों के बीच बैठे। शरीर अस्वस्थ था, लेकिन आत्मा दृढ़। सभा को संबोधित किया, जहाँ नीतीश कुमार भी उपस्थित थे। जैसे ही जेपी ट्रस्ट से बाहर निकले, एक बार फिर भीड़ को देख भावनाओं में बह निकले। गाड़ी तक आते-आते रुके, दीवार का सहारा लिया, और फिर से रोने लगे। यह विदाई थी... और अनकही विदाई थी।

"फिर वो कभी लौट कर नहीं आए..."
वेद प्रकाश भावुक होकर लिखते हैं—"गाड़ी आगे बढ़ी और पीछे छोड़ गई धूलों का गुब्बार... और फिर वो कभी लौट कर नहीं आए।"

2004 की मुलाकात और 'बाबा का आशीर्वाद'


लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी एक यादगार मुलाकात हुई। चंद्रशेखर जी के साथ प्रचार में जाने का अवसर मिला। जैसे ही पप्पू भैया का फोन आया—"बाबा बुला रहे हैं," तुरंत पहुंचे। बाबा ने पूछा—"अटल जी के प्रत्याशी के क्या हाल हैं?" वेद प्रकाश ने कहा, "बलिया में अध्यक्ष जी ही हैं—ना पक्ष है, ना विपक्ष।"
चंद्रशेखर जी मुस्कराए, और देश की राजनीति पर चिर-परिचित आलोचनात्मक अंदाज़ में बात करते हुए प्रचार के लिए रवाना हो गए। जाने से पहले आशीर्वाद देना नहीं भूले। वेद प्रकाश कहते हैं—"बड़ों का आशीर्वाद ही जीवन की पूंजी और प्रेरणा है।"

संसद की आवाज, जो अब गूंज नहीं रही


आज जब उनकी जयंती पर उन्हें याद किया जाता है, तो यह एहसास गहरा होता है कि अब संसद में शायद ही कोई ऐसा व्यक्तित्व शेष है, जिसके खड़े होते ही सदन शांत हो जाए और संवाद का गतिरोध स्वयं समाप्त हो जाए।

श्रद्धांजलि एक युग पुरुष को


चंद्रशेखर जी को याद करते हुए वेद प्रकाश ने न केवल स्मृतियों को साझा किया है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह भावुक दस्तावेज़ छोड़ दिया है, जो यह बताता है कि राजनीति में रिश्तों की ऊष्मा, संवेदना और त्याग का स्थान क्या हुआ करता था।

देश के लिए जिया गया जीवन कभी समाप्त नहीं होता—बल्कि वह प्रेरणा बनकर युगों तक मार्गदर्शन करता है।

आज उनकी जन्म जयंती पर उन्हें शत्-शत् नमन।
- वरिष्ठ अधिवक्ता वेद प्रकाश

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