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क्या आपको पता है कि आपका जीवन कौन चला रहा है और किसके द्वारा संचालित किया जा रहा है?

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Dainik India News

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क्या आपको पता है कि आपका जीवन कौन चला रहा है और किसके द्वारा संचालित किया जा रहा है?

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।आप यह मानकर जीवन जीते हैं कि आप स्वयं अपने जीवन के संचालक हैं। आप सोचते हैं, निर्णय लेते हैं, कर्म करते हैं और फिर उन्हीं कर्मों के परिणामों को अपना भाग्य कहकर स्वीकार कर लेते हैं। पर क्या आपने कभी गहराई से यह प्रश्न उठाया है कि यह सोच उत्पन्न कहाँ से होती है? यह निर्णय किसके संकेत पर आकार लेता है? और यह कर्म—क्या वास्तव में आपकी स्वतंत्र इच्छा का परिणाम है, या किसी अदृश्य सत्ता के निर्देश पर घटित हो रहा है?


सामान्यतः आप मन को इसका उत्तरदायी ठहरा देते हैं। कभी कहते हैं—मेरा मन नहीं लग रहा। कभी कहते हैं—मन बहुत प्रसन्न है। फिर आत्मा की चर्चा करते हैं—आत्मा शाश्वत है, चेतना अमर है। कुछ लोग चेतन और अचेतन मन की व्याख्या देकर संतोष कर लेते हैं। पर प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता। क्या केवल मन, आत्मा, चेतन और अचेतन से ही जीवन की पूरी व्यवस्था संचालित हो सकती है, या इनके अतिरिक्त भी कोई ऐसा तत्त्व है, जो बिना आपकी अनुमति के निरंतर कार्य कर रहा है?


आप साँस ले रहे हैं, पर आपने यह निश्चित नहीं किया कि अगली साँस कब आएगी। आपका हृदय धड़क रहा है, पर आपने उसे कोई आदेश नहीं दिया। पाचन, रक्त-संचार, कोशिकाओं का निर्माण और क्षय—सब कुछ स्वतः घटित हो रहा है। यदि मन ही सर्वशक्तिमान होता, तो वह थकान को तुरंत समाप्त कर देता। यदि आत्मा ही अकेली संचालक होती, तो असंतुलन और विक्षोभ का अस्तित्व ही न होता। तब यह प्रश्न और अधिक तीखा हो उठता है कि यह सब कौन कर रहा है?


कभी आपने अनुभव किया है कि बिना किसी स्पष्ट कारण के भीतर भय उत्पन्न हो जाता है? कभी अकारण क्रोध उभर आता है, और कभी अचानक करुणा या प्रेम का भाव उमड़ पड़ता है। आप इसे अपना स्वभाव मान लेते हैं और कह देते हैं—मैं ऐसा ही हूँ। पर क्या स्वभाव इतना यांत्रिक हो सकता है कि वह परिस्थिति से पहले ही प्रतिक्रिया देने लगे? क्या वास्तव में कोई और शक्ति है, जो आपके भावों और व्यवहार को दिशा दे रही है?
प्राचीन वैदिक और योग परंपरा इस प्रश्न से अपरिचित नहीं थी। वहाँ मन को अंतिम सत्ता नहीं माना गया। वहाँ आत्मा को भी अकेला संचालक स्वीकार नहीं किया गया। उन शास्त्रों में यह स्पष्ट कहा गया कि मन और आत्मा के मध्य, देह और चेतना के बीच, एक ऐसा सूक्ष्म तंत्र कार्यरत है, जो दिखाई नहीं देता, पर जिसका प्रभाव सम्पूर्ण जीवन पर पड़ता है।


इसी सूक्ष्म तंत्र को नाड़ी-तंत्र कहा गया। यह न तो नस है, न धमनी, न ही रक्त का प्रवाह। यह वह ऊर्जा-पथ है, जिसमें जीवन-शक्ति प्रवाहित होती है। जैसे विद्युत स्वयं दिखाई नहीं देती, पर यंत्रों को गतिमान कर देती है, वैसे ही यह नाड़ी-शक्ति मन, भावना, विचार और कर्म—सबको संचालित करती है। आप इसे स्वीकार करें या अस्वीकार करें, इसका प्रभाव आपके जीवन में निरंतर बना रहता है।


योगशास्त्र के अनुसार मानव देह में तीन प्रधान नाड़ियाँ हैं—इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। सामान्य मनुष्य का जीवन इड़ा और पिंगला के बीच ही बीत जाता है। कभी भावुकता, कभी आवेग, कभी प्रेम, कभी क्रोध। व्यक्ति इन्हीं प्रवृत्तियों को अपना स्वभाव समझ बैठता है, जबकि वास्तव में यह नाड़ियों के असंतुलित प्रवाह का परिणाम होता है।


इन दोनों के मध्य स्थित सुषुम्ना नाड़ी संतुलन का मार्ग है। यही वह धारा है, जो मनुष्य को स्थिरता, स्पष्टता और आत्मबोध की ओर ले जाती है। पर यह धारा अधिकांश लोगों में सुप्त रहती है। प्रश्न यह नहीं है कि सुषुम्ना क्या है, प्रश्न यह है कि वह जागृत क्यों नहीं होती और उसके जागरण से जीवन में क्या आमूलचूल परिवर्तन संभव है।
यहीं से इस श्रृंखला का वास्तविक आरंभ होता है।

क्योंकि जब तक मनुष्य यह नहीं समझता कि मन, आत्मा, चेतन और अचेतन के अतिरिक्त भी कोई शक्ति उसके जीवन को संचालित कर रही है, तब तक वह स्वयं को ही जीवन का कर्ता मानने के भ्रम में फँसा रहता है।
अगले भाग में यह स्पष्ट किया जाएगा कि यह शक्ति कब सक्रिय होती है, कैसे पहचानी जाती है और क्यों इसके संतुलन पर ही जीवन का सुख, दुःख और दिशा निर्भर करती है।

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