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लखनऊ में घर उजाड़ने की पीड़ा: क्या विकास के नाम पर मानवता भूल गई सरकार?

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Dainik India News

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लखनऊ में घर उजाड़ने की पीड़ा: क्या विकास के नाम पर मानवता भूल गई सरकार?

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ। आज पंतनगर में महिलाओं और बच्चों ने प्रदर्शन किया। उनका एक नया ही रूप देखा गया। मीडिया भी वहाँ पहुँचकर हैरान रह गई। मीडिया ने पूछा कि आप लोग आँख, कान, नाक, बंद करके क्या कर रहे हैं? प्रदर्शनकारियों के घर वालों ने कहा कि जिस तरह प्रदेश सरकार अंधी, बहरी, गूंगी हो गई है, उसी तरह हम लोग भी प्रदर्शन करेंगे। मीडिया द्वारा पूछे गए सवाल पर युवकों ने जवाब दिया कि कोविड के बाद तो वैसे भी हम बर्बाद हुए हैं। हमारे मां-बाप का इलाज चल रहा है, किसी का ब्लड प्रेशर का इलाज चल रहा है, किसी का शुगर का इलाज चल रहा है। हम इलाज कराने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। लोन लेकर घर बनवाया है, घर की ईएमआई नहीं चुका पा रहे हैं और आज सरकार हमारा घर तोड़ने जा रही है। अगर हम लोगों का आशियाना नहीं बचेगा, तो हम सड़कों पर उतरेंगे और विधानसभा पहुँच कर सामूहिक आत्मदाह करेंगे।

स्थानीय नागरिकों का कहना है अगर हमारा आधार कार्ड, हमारा वोटर कार्ड, हमारे मकान की रजिस्ट्री, हमारे मकान का दाखिल-खारिज, हमारे मकान का बिजली बिल, हमारे मकान का हाउस टैक्स सब अवैध है, तब हमारा वोटर कार्ड भी अवैध है। उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की कि दोबारा चुनाव कर दें और जो हम लोगों ने वोट दिया है उसे वोट को कैंसिल कर दें। क्योंकि हमारे ही वोट से जीती हुई सरकार भी अवैध है।

लखनऊ की रिवरफ्रंट परियोजना के तहत अवैध निर्माणों को गिराने की बात ने शहर के निवासियों के दिलों में दर्द और आक्रोश भर दिया है। जिन घरों को लोग अपने खून-पसीने से बना चुके थे, अब उन्हें अवैध बताकर तोड़ा जा रहा है। एक महिला के मन में घर की कोमल भावना को समझना कोई आसान बात नहीं है। यह दर्द वही समझ सकते हैं जिन्होंने अपनी माँ, बहन, बेटी या जीवन साथी के साथ घर बनाया और बसाया है।

रातों-रात अपने सपनों का घर खोने का दर्द, उस पीड़ा को केवल वही लोग समझ सकते हैं जो इस भयानक त्रासदी से गुजर रहे हैं। हर एक ईंट जो जोड़कर उन्होंने अपना आशियाना बनाया था, उसमें उनके सपनों और भावनाओं की गहरी छाप है। एक घर सिर्फ चार दीवारों से नहीं बनता, उसमें एक परिवार की उम्मीदें, सपने, और उनकी मेहनत भी जुड़ी होती हैं।

यह सब तब हो रहा है जब देश ने हाल ही में कोविड-19 महामारी के भयावह दौर से उभरना शुरू किया है। कितने परिवार अब भी बेरोजगारी और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। महामारी ने न जाने कितने लोगों की रोजी-रोटी छीन ली, उनके जीवन की स्थिरता को हिला दिया। ऐसे में सरकार द्वारा इस तरह की हिटलरशाही से लोगों के मन में डर का मातम छाया हुआ है। यह समय सरकार के लिए मानवता दिखाने का है, न कि लोगों को और ज्यादा तकलीफ देने का।

इन घरों को अवैध करार देकर तोड़ने से पहले, यह सवाल उठता है कि जब ये घर बन रहे थे, तब प्रशासनिक अधिकारी और संबंधित मंत्रालय कहाँ थे? क्या वे अपनी जिम्मेदारी से सोते रहे? यदि ये घर अवैध हैं, तो पहले उन अधिकारियों और मंत्रालय के लोगों के घर तोड़े जाने चाहिए जिन्होंने इन निर्माणों की अनुमति दी। इसके अलावा, सरकार ने सालों से बिजली, पानी, और टैक्स के नाम पर जो पैसे वसूले हैं, उन्हें ब्याज सहित इन निवासियों को वापस किया जाना चाहिए।

इस घटना के पीछे भाजपा सरकार की प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास योजना की वास्तविकता पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या यह सब रिवरफ्रंट बनाने वाली कंपनियों से चुनावी चंदा वसूलने के लिए किया जा रहा है? इस मुद्दे की गहन जाँच होनी चाहिए।

जब ये अवैध निर्माण हो रहे थे, तब सिंचाई विभाग कहाँ सो रहा था? उनके अधिकारी कहां थे? जिन लोगों ने रजिस्ट्री की, क्या उन्होंने घूस नहीं दी होगी? क्या उन पर सरकार कार्रवाई करेगी? ये बहुत सारे मुद्दे हैं जो उठाने वाले हैं। जब बिजली का कनेक्शन हुआ था, तब क्या पेपर देखे गए थे? जब बैंक ने लोन दिया था, तब क्या पेपर देखे गए थे? अगर उस समय सब कुछ ठीक था, तो आज यह गलत क्यों है? ये सवाल तो उठेंगे सरकार की मंशा और उसकी कार्यप्रणाली पर। जो व्यवस्था को देखने और सुधारने वाले हैं, वे कहाँ थे?

सरकार को अपनी नीतियों और योजनाओं का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास की दौड़ में किसी का घर और जीवन बर्बाद न हो। यह अन्याय तुरंत रुकना चाहिए। भाजपा को अपनी राजनीतिक हार का बदला परिवारवालों से नहीं लेना चाहिए। हम हर परिवार वाले के साथ खड़े हैं और उनके दर्द को समझते हैं।

यह समय है कि हम मानवता को प्राथमिकता दें। जिन लोगों ने मेहनत से अपने घर बनाए हैं, उन्हें उजाड़ने से पहले उनकी पीड़ा को समझा जाए। सरकार को अपनी नीतियों और कार्यप्रणाली का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास की दौड़ में किसी का घर और जीवन बर्बाद न हो।

रातों-रात बेघर होने का खौफ, उन परिवारों के बच्चों की आँखों में देखा जा सकता है। वे जो घर लौटने की उम्मीद लिए थे, अब अपनी आँखों के सामने अपने सपनों का महल टूटता देख रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने भाजपा की जीत पर जश्न मनाया और मिठाइयाँ बाँटी थीं। आज उन्हीं के घर उजड़ रहे हैं।

सरकार को यह समझना होगा कि घर सिर्फ चार दीवारों से नहीं बनते, उसमें लोगों की मेहनत, प्यार, और भावनाएँ भी शामिल होती हैं। एक घर को उजाड़ने से पहले उसके भीतर बसने वाली ज़िन्दगियों की पीड़ा को महसूस करना चाहिए।

लखनऊ के इन निवासियों की आवाज़ को सुना जाना चाहिए। उनका दर्द, उनकी पीड़ा, और उनकी उम्मीदें सरकार तक पहुँचनी चाहिए। यह आवश्यक है कि इस मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठकर मानवता को प्राथमिकता दी जाए।

सरकार को अपनी नीतियों और योजनाओं का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास की दौड़ में किसी का घर और जीवन बर्बाद न हो। इस त्रासदी को रोकने का समय अब है, और सरकार को यह समझना होगा कि गलतियाँ कहाँ हुईं और उन गलतियों की सजा सही लोगों को मिलनी चाहिए।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि हम लोग पचास सालों से यहाँ रह रहे हैं और हमारे घरों का दाखिल-खारिज सब हुआ है, एलडीए से नक्शा पास है। कुछ लोग बता रहे हैं कि रिलेशन से हमें NOC मिला हुआ है। सैकड़ों घरों में रजिस्ट्री के पेपर दाखिल-खारिज के पेपर जमा किए गए हैं। वहाँ पर बच्चे बिलख रहे हैं, रो रहे हैं। कुछ परिवारों का आलम यह है कि कोविड के दौरान उनके घर में पैसा कमाने वाले की मृत्यु हो गई थी, तो पूरा परिवार एक कमरे में रह रहा है, बाकी घर किराए पर उठाकर उससे उनकी जीविका चल रही थी।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब हम पांच दसकों पहले हम यहाँ घर बना लिए थे, उस समय नगर निगम कहाँ था? लोग कह रहे हैं कि योगी जी के अधिकारी उन्हें गुमराह कर रहे हैं। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि हमने लोन लेकर घर खरीदा था, घर का लोन चुका दिया है। कुछ का कहना है कि हम गाँव की जमीन बेचकर घर खरीदे थे और शहर में रहकर हम अपने परिवार का गुजर-बसर कर रहे थे। अगर हमारा मकान तोड़ दिया जाएगा, हमारा ठिकाना खत्म हो जाएगा। स्थानीय नागरिकों की मांग है कि मुख्यमंत्री बिना मुआवजा दिए किसी का घर न उजाड़ें।

सरकार को यह समझना होगा कि जो लोग अपने मेहनत से अपने घर बनाए हैं, उनके सपनों को उजाड़ना मानवता के खिलाफ है। इस मुद्दे पर जागरूकता फैलाना और लोगों की भावनाओं को समझना आवश्यक है।

पंतनगर खुर्रम नगर अबरार नगर के नागरिक यह भी मांग कर रहे हैं कि उनके वोट से जीते पार्षद, मेयर, विधायक, सांसद, अबैध क्या चुनाव आयोग इन लोगों की सदस्यता खत्म करके फिर से चुनाव कराएगी? इस खबर में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या चुनाव आयोग इन मांगों को सुनकर फिर से चुनाव कराएगा?

सरकार को चाहिए कि वह इन मुद्दों का समाधान निकालने के लिए आवश्यक कदम उठाए और इन परिवारों को न्याय दिलाए।

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