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संस्कृत चेतना से राष्ट्रबोध तक: लखनऊ में नौ दिवसीय संयुक्त प्रबोधन वर्ग का भव्य शुभारंभ

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Dainik India News

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संस्कृत चेतना से राष्ट्रबोध तक: लखनऊ में नौ दिवसीय संयुक्त प्रबोधन वर्ग का भव्य शुभारंभ

अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांतरंजन के उद्बोधन से अभिसिंचित हुआ उद्घाटन सत्र

संस्कृत भाषा को अखण्ड भारत की वैचारिक आधारशिला बताते हुए राष्ट्रनिर्माण पर दिया गया विशेष बल

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।संस्कृतभारती द्वारा आयोजित अवधप्रांत एवं कर्णपुर प्रांत के नौ दिवसीय संयुक्त प्रबोधन वर्ग का भव्य उद्घाटन 1 जनवरी को जे.सी. गेस्टहाउस, निरालानगर, लखनऊ में अत्यंत गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस प्रबोधन वर्ग का शुभारंभ अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, श्री स्वांतरंजन के करकमलों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में श्री स्वांतरंजन के साथ जितेन्द्र प्रताप सिंह (सम्पर्क प्रमुख, पूर्व क्षेत्र), चन्द्र भूषण त्रिपाठी (अध्यक्ष, अवधप्रांत) तथा धर्मेन्द्र सिंह तोमर (वर्गाधिकारी) की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष वैचारिक ऊँचाई प्रदान की। यह नौ दिवसीय प्रबोधन वर्ग 1 जनवरी से प्रारंभ होकर 9 जनवरी तक संचालित होगा।
उद्घाटन सत्र में जितेन्द्र प्रताप सिंह ने स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत करते हुए पूर्व क्षेत्र की विविध संगठनात्मक एवं वैचारिक गतिविधियों पर प्रकाश डाला तथा संस्कृतभारती के माध्यम से समाज में संस्कृत चेतना के विस्तार की आवश्यकता को रेखांकित किया। इसके उपरांत मुख्य अतिथि श्री स्वांतरंजन के प्रेरक बौद्धिक संबोधन से संपूर्ण सभा वैचारिक रूप से अभिसिंचित हो उठी। उन्होंने संस्कृत भाषा के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, अपितु भारतीय जीवन-दृष्टि, चिंतन-परंपरा और संस्कारों की आधारशिला है। उन्होंने शिक्षणार्थियों को यह भी बोध कराया कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में संस्कृत भाषा का पुनरुत्थान राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।


अपने उद्बोधन में श्री स्वांतरंजन ने यह विशेष रूप से रेखांकित किया कि अखण्ड भारत की संकल्पना केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक एकात्मता से ही साकार हो सकती है, और इस एकात्मता का मूल संस्कृत साहित्य एवं संस्कारों में निहित है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा में न केवल शब्द हैं, बल्कि वह जीवन को संतुलित, मर्यादित और उदात्त बनाने की क्षमता रखती है। इस दृष्टि से संस्कृतभारती द्वारा आयोजित यह प्रबोधन वर्ग समय की मांग के अनुरूप एक सशक्त वैचारिक अभियान है।
संस्कृतभारती, पूर्व क्षेत्र के संगठन मंत्री श्री प्रमोद पंडित ने इस अवसर पर काशी, गोरक्ष, अवध एवं कर्णपुर प्रांतों के क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित सहभाग से आयोजित इस भाषा-शिक्षण एवं प्रशिक्षण शिविर के लिए सभी आयोजकों, प्रशिक्षकों एवं शिक्षणार्थियों के प्रति साधुवाद ज्ञापित किया। वहीं डॉ. श्यामलेष एवं प्रांत मंत्री अनिल कुमार ने वर्ग आयोजन में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करते हुए प्रशिक्षणार्थियों की सक्रिय सहभागिता से इस आयोजन को सफल बनाने में सराहनीय योगदान दिया।
अंततः यह कहना समीचीन होगा कि संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, अपितु मानव जीवन के परिष्कार का शाश्वत साधन है। संस्कृत का अध्ययन व्यक्ति के चिंतन को सूक्ष्म, वाणी को शुद्ध और आचरण को संस्कारित करता है। यही कारण है कि संस्कृत से जुड़ने वाला साधक केवल भाषाज्ञ नहीं बनता, बल्कि जीवन-मूल्यों से समृद्ध एक जागरूक नागरिक के रूप में राष्ट्र और समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनता है। इस प्रकार का प्रबोधन वर्ग न केवल भाषा-प्रशिक्षण है, बल्कि चेतना-जागरण का वह यज्ञ है, जिसमें सहभागी होकर प्रत्येक शिक्षणार्थी वैचारिक रूप से मंत्रमुग्ध और आत्मिक रूप से परिष्कृत होता है।

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