ब्रेकिंग न्यूज़
पद्मश्री डॉ. एस. सी. राय की धर्मपत्नी श्रीमती मधु राय का निधन, शोक की लहर | हिंदी केवल भाषा नहीं, भारत की आत्मा का स्वर है—अब इसे जीवन और व्यवस्था की भाषा बनाने का समय | जिस दिन भारत अपनी हिंदी को भूल जाएगा, उसी दिन अपनी आत्माभिव्यक्ति का एक अध्याय खो देगा—अजय दीप सिंह IAS | हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, भारत की आत्मा की आवाज है—अब राजभाषा को राजकाज की धड़कन बनाने का समय -अजय दीप सिंह | महज भूमि विवाद से नहीं बनता जातिगत अपराध, SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के लिए जातिगत अपमान का प्रथमदृष्टया आधार अनिवार्य | आखिरी 30 मीटर में भारत की बाजी! चीन को 0.10 सेकंड से पछाड़कर रचा इतिहास | अच्छी ड्राइविंग पर कम बीमा प्रीमियम का विचार : गडकरी | 100 वेंटिलेटर, मरीजों के लिए सिर्फ 38! बाकी 62 की क्षमता आखिर कहां अटकी? | पद्मश्री डॉ. एस. सी. राय की धर्मपत्नी श्रीमती मधु राय का निधन, शोक की लहर | हिंदी केवल भाषा नहीं, भारत की आत्मा का स्वर है—अब इसे जीवन और व्यवस्था की भाषा बनाने का समय | जिस दिन भारत अपनी हिंदी को भूल जाएगा, उसी दिन अपनी आत्माभिव्यक्ति का एक अध्याय खो देगा—अजय दीप सिंह IAS | हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, भारत की आत्मा की आवाज है—अब राजभाषा को राजकाज की धड़कन बनाने का समय -अजय दीप सिंह | महज भूमि विवाद से नहीं बनता जातिगत अपराध, SC/ST Act की धारा 3(1)(r) के लिए जातिगत अपमान का प्रथमदृष्टया आधार अनिवार्य | आखिरी 30 मीटर में भारत की बाजी! चीन को 0.10 सेकंड से पछाड़कर रचा इतिहास | अच्छी ड्राइविंग पर कम बीमा प्रीमियम का विचार : गडकरी | 100 वेंटिलेटर, मरीजों के लिए सिर्फ 38! बाकी 62 की क्षमता आखिर कहां अटकी? |
हाइलाइट न्यूज़
आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर मधुबन तहसील में बीएलओ व पदाभिहित अधिकारियों की आहुत हुईं मीटिंग चिन्मय मिशन आश्रम मे सम्पन्न हुई लोकभारती की मंगलमान बैठक - जितेन्द्र प्रताप सिंह अर्जुन क्रिकेट अकादमी में क्रिकेट का महासंगम मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को लेकर सारी तैयारियां पूर्ण, चप्पे-चप्पे पर रहेगी पुलिस की नजर यूपी सरकार ने MSME सेक्टर को दी नई ऊर्जा, अब तक बांटे साढ़े छह लाख करोड़ के लोन  सैनिकों के नाम एक हजार यूनिट ‘रक्त’, राष्ट्रसेवा का अनूठा संकल्प अयोध्या, काशी और मथुरा की इस भूमि ने सदियों से देश को दिखाई है राह : ज्योतिरादित्य सिंधिया जानकीपुरम बिस्तार में लगा कूड़े का अंबार:कचरे से उठती बदबू से मोहल्लेवासी परेशान, समस्या के सामधान की मांग आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर मधुबन तहसील में बीएलओ व पदाभिहित अधिकारियों की आहुत हुईं मीटिंग चिन्मय मिशन आश्रम मे सम्पन्न हुई लोकभारती की मंगलमान बैठक - जितेन्द्र प्रताप सिंह अर्जुन क्रिकेट अकादमी में क्रिकेट का महासंगम मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को लेकर सारी तैयारियां पूर्ण, चप्पे-चप्पे पर रहेगी पुलिस की नजर यूपी सरकार ने MSME सेक्टर को दी नई ऊर्जा, अब तक बांटे साढ़े छह लाख करोड़ के लोन  सैनिकों के नाम एक हजार यूनिट ‘रक्त’, राष्ट्रसेवा का अनूठा संकल्प अयोध्या, काशी और मथुरा की इस भूमि ने सदियों से देश को दिखाई है राह : ज्योतिरादित्य सिंधिया जानकीपुरम बिस्तार में लगा कूड़े का अंबार:कचरे से उठती बदबू से मोहल्लेवासी परेशान, समस्या के सामधान की मांग
उत्तर प्रदेश सरकार English

समता के नाम पर संरचित विभाजन : UGC के ‘Equity Regulations’ और भारतीय विश्वविद्यालयों का वैचारिक संकट

D

Dainik India News

5058 views
समता के नाम पर संरचित विभाजन : UGC के ‘Equity Regulations’ और भारतीय विश्वविद्यालयों का वैचारिक संकट

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।भारत की विश्वविद्यालयीय व्यवस्था केवल शिक्षण का ढाँचा नहीं, बल्कि राष्ट्र की वैचारिक प्रयोगशाला है। यहीं से विचार जन्म लेते हैं, यहीं से असहमति आकार लेती है और यहीं से वह बौद्धिक ऊर्जा प्रवाहित होती है, जो समाज को जड़ता से मुक्त करती है। ऐसे में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations” को समझना केवल शिक्षाविदों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर उस नागरिक का दायित्व है जो राष्ट्र के बौद्धिक भविष्य को लेकर चिंतित है।


UGC के इन नियमों का पहला प्रमुख प्रावधान यह है कि प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्था में ‘Equal Opportunity Cell’ और ‘Equity Committee’ का गठन अनिवार्य होगा, जो जाति, वर्ग, लिंग, धर्म, विकलांगता अथवा सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले कथित भेदभाव की निगरानी करेगी। देखने में यह व्यवस्था सुरक्षा और न्याय का आश्वासन देती है, किंतु यहीं से विश्वविद्यालयों की आत्मा पर पहला प्रहार होता है। शिक्षा के परिसरों में जब संवाद की जगह निगरानी और विश्वास की जगह संदेह स्थापित हो जाता है, तब ज्ञान का प्रवाह अवरुद्ध होने लगता है।


दूसरा नियम यह कहता है कि भेदभाव केवल प्रत्यक्ष आचरण तक सीमित नहीं माना जाएगा, बल्कि ‘अप्रत्यक्ष’ या ‘अंतर्निहित’ (implicit) भेदभाव भी दंडनीय होगा। यह प्रावधान अत्यंत खतरनाक है, क्योंकि यह मंशा और अनुभूति को तथ्य से ऊपर स्थापित करता है। विश्वविद्यालय, जहाँ विचारों की टकराहट से सत्य का जन्म होता है, वहाँ यदि हर असहमति को संभावित भेदभाव के रूप में देखा जाएगा, तो छात्र और शिक्षक दोनों आत्म-सेंसरशिप के शिकार हो जाएंगे।


UGC का तीसरा प्रावधान संस्थानों पर यह बाध्यता डालता है कि वे संवेदनशीलता प्रशिक्षण, जागरूकता कार्यक्रम और नियमित रिपोर्टिंग तंत्र लागू करें, अन्यथा उन पर अनुदान रोकने या मान्यता पर पुनर्विचार जैसे कठोर कदम उठाए जा सकते हैं। इस नियम से शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन से हटकर प्रशासनिक अनुपालन में बदलने का खतरा उत्पन्न होता है। विश्वविद्यालय तब शोध और नवाचार के केंद्र नहीं, बल्कि नियम-पुस्तिकाओं के पालन की प्रयोगशालाएँ बन जाते हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि ये नियम विश्वविद्यालयों के लिए घातक क्यों हैं? कारण अत्यंत स्पष्ट है।

विश्वविद्यालयों की शक्ति उनकी वैचारिक स्वायत्तता में निहित होती है। जब बाहरी वैचारिक ढाँचा यह तय करने लगे कि क्या कहा जा सकता है, क्या सोचा जा सकता है और किस दृष्टिकोण से प्रश्न पूछे जा सकते हैं, तब शिक्षा मुक्त नहीं रह जाती। वह नियंत्रित बौद्धिकता का रूप धारण कर लेती है।


इन नियमों का सबसे गहरा और चिंताजनक प्रभाव विद्यार्थियों की विचार-क्रांति पर पड़ेगा। छात्र जीवन प्रश्न पूछने, परंपराओं को चुनौती देने और नए विचार गढ़ने का काल होता है। किंतु यदि छात्र यह महसूस करने लगें कि हर प्रश्न, हर बहस और हर आलोचना किसी न किसी पहचान के विरुद्ध अपराध के रूप में देखी जा सकती है, तो उनकी बौद्धिक निर्भीकता समाप्त हो जाएगी। विचारों की क्रांति भय में बदल जाएगी।


समता और समरसता के अंतर को यहाँ समझना अनिवार्य है। UGC के नियम समता को प्रशासनिक गणना के रूप में परिभाषित करते हैं—जहाँ प्रत्येक समूह को अलग-अलग संरचनाओं के माध्यम से संतुलित किया जाता है। इसके विपरीत, भारत की राष्ट्रीय चेतना—जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करता है—समरसता पर आधारित है, जहाँ समाज स्वाभाविक रूप से एकीकृत होता है और व्यक्ति की पहचान उसकी क्षमता, कर्म और राष्ट्रबोध से तय होती है, न कि स्थायी श्रेणियों से।


वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में समस्याएँ अवश्य हैं, किंतु उसका मूल ढाँचा योग्यता, प्रतिस्पर्धा और बौद्धिक उपलब्धि पर आधारित रहा है। UGC के नए नियम इस ढाँचे को भीतर से बदलते हैं। वे यह संदेश देते हैं कि पहचान अब केवल सामाजिक तथ्य नहीं, बल्कि संस्थागत निर्णय का केंद्र होगी। यही वह बिंदु है जहाँ शिक्षा सामाजिक इंजीनियरिंग में परिवर्तित हो जाती है।
इसके दूरगामी परिणाम केवल अकादमिक नहीं होंगे। समाज में एक ऐसी पीढ़ी विकसित हो सकती है जो स्वयं को पहले किसी श्रेणी का प्रतिनिधि मानेगी, नागरिक बाद में। राष्ट्र के लिए यह स्थिति अत्यंत घातक है, क्योंकि राष्ट्र निर्माण समान नागरिक चेतना से होता है, न कि वर्गीकृत पहचान से। जब विश्वविद्यालय विभाजित चेतना का उत्पादन करने लगते हैं, तब समाज का एकीकरण असंभव हो जाता है।


तो विकल्प क्या है? विकल्प यह है कि:
समता को प्रारंभिक अवसरों तक सीमित रखा जाए
भेदभाव के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो, किंतु विचारों की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहे
विश्वविद्यालयों को शिकायत-केंद्र नहीं, संवाद-केंद्र बनाया जाए।
और शिक्षा को राजनीति का उपकरण बनने से बचाया जाए।
UGC को यह समझना होगा कि नियम बनाना आसान है, पर बौद्धिक संस्कृति बनाना कठिन। यदि नियम संस्कृति को कुचलने लगें, तो वे समाधान नहीं, समस्या बन जाते हैं।
अंततः यह लेख किसी नियम का विरोध नहीं, बल्कि भारत की शिक्षा-आत्मा का पक्षधर वक्तव्य है। क्योंकि शिक्षा में किया गया हर प्रयोग आने वाली पीढ़ियों की चेतना पर स्थायी छाप छोड़ता है। और राष्ट्र वही होता है, जैसी उसकी शिक्षा होती है।


यदि शिक्षा भय, संदेह और विभाजन से संचालित होगी, तो समाज भी वैसा ही बनेगा।
और यही वह सत्य है, जिसे समझना आज सबसे अधिक आवश्यक है।

फोटो गैलरी

टिप्पणियाँ

अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहले टिप्पणी करें!