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हृदय का उदारीकरण ही उन्नति का मूलमंत्र

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हृदय का उदारीकरण ही उन्नति का मूलमंत्र

दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ।वर्तमान युग में जब मनुष्य व्यापारिक उन्नति और सामाजिक प्रतिष्ठा को जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि मान बैठा है, तब यह स्मरण रखना आवश्यक हो जाता है कि बाह्य विस्तार से पूर्व अंतःकरण का विस्तार अनिवार्य है। जो व्यक्ति केवल लाभ, लाभांश और प्रशंसा की परिधि में सिमट जाता है, वह क्षणिक सफलता तो अर्जित कर लेता है, किंतु स्थायी सम्मान और आत्मिक संतोष से वंचित रह जाता है।


व्यापार में वृद्धि करनी हो अथवा समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करनी हो, तो उसका प्रथम सोपान है—हृदय का उदार होना। उदारता केवल दान तक सीमित नहीं है; यह विचार, व्यवहार और दृष्टिकोण की व्यापकता का नाम है। जितना सुदृढ़ और संवेदनशील आपका समाज से संबंध होगा, समाज उतने ही बहुगुणित रूप में आपको प्रत्युत्तर देगा। यह प्रकृति का अटल विधान है—जो देता है, वह लौटता है, किंतु समाज कई गुना लौटाता है।


आज के समय में मानसिक अवसाद, आंतरिक शून्यता और शारीरिक-मानसिक पीड़ा से जूझते व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में समाधान बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन के पुनर्मूल्यांकन और आत्मचिंतन में निहित है। चिंता नहीं, चिंतन आवश्यक है—क्या हमारा जीवन केवल ‘मैं’ तक सीमित हो गया है? क्या हमने ‘हम’ को विस्मृत कर दिया है?
मनुष्य जब समाज से कटता है, तब उसका मन संकुचित होता है और यही संकुचन कालांतर में अवसाद का कारण बनता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति समाज के दुख-दर्द को अपना समझता है, सेवा को साधना मानता है और दूसरों के जीवन में प्रकाश बनने का प्रयास करता है, उसका स्वयं का जीवन भी प्रकाशमय हो उठता है।
यहीं पर वेदांत दर्शन की वह गूढ़ किंतु अत्यंत उपयोगी अवधारणा सामने आती है, जिसे प्रकृति और पुरुष कहा गया है। वेदांत के अनुसार प्रकृति वह समस्त दृश्य जगत है—पंचमहाभूत, वनस्पति, जल, वायु, पृथ्वी, शरीर और मन—जो परिवर्तनशील है। जबकि पुरुष वह चेतन तत्व है, जो इन सबका साक्षी है—शुद्ध चेतना, आत्मा, द्रष्टा। प्रकृति कर्म करती है, पुरुष साक्षी भाव से उसे प्रकाशित करता है।


वेदांत यह सिखाता है कि जब तक पुरुष स्वयं को प्रकृति से पृथक मानता है, तब तक वह बंधन में रहता है। किंतु जब वह यह जान लेता है कि प्रकृति के माध्यम से सेवा करना ही पुरुष का धर्म है, तब बंधन मुक्ति में परिवर्तित हो जाता है। प्रकृति की सेवा—अर्थात् पर्यावरण संरक्षण, जीव-जंतुओं की रक्षा, और मानव समाज के प्रति करुणा—वास्तव में पुरुष की चेतना को शुद्ध करने का मार्ग है।
यदि कोई ईश्वर की सेवा करना चाहता है, तो वेदांत कहता है कि उसे किसी एक स्थान या प्रतीक में सीमित न रखे। प्रकृति में ईश्वर की अभिव्यक्ति है और पुरुष में उसकी अनुभूति। अतः जब मनुष्य प्रकृति की रक्षा करता है और पुरुषार्थ के माध्यम से समाज का कल्याण करता है, तब वही ईश्वर-सेवा का श्रेष्ठतम रूप बन जाता है। ऐसे निष्काम और प्रकाशमय प्रयासों का फल देने में परमात्मा कभी विलंब नहीं करता।


यह संसार केवल लेन-देन से नहीं, बल्कि चेतना और संवेदना के संतुलन से संचालित होता है। जब मनुष्य अपने पुरुषत्व—अर्थात् विवेक, करुणा और उत्तरदायित्व—को जाग्रत कर प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करता है, तब व्यापार में विश्वास बढ़ता है, समाज में प्रतिष्ठा स्वतः आती है और जीवन में वह संतोष जन्म लेता है, जिसे कोई बाह्य उपलब्धि नहीं दे सकती।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने हृदय को संकीर्ण स्वार्थों से मुक्त करें, वेदांत के इस शाश्वत सत्य को जीवन में उतारें कि प्रकृति की रक्षा और पुरुष की चेतना का विकास—यही मानव जीवन की पूर्णता है। क्योंकि जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है, उसी दिन उसका जीवन केवल सफल नहीं, सार्थक और प्रकाशमान हो जाता है।

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