वरिष्ठता विवाद पर 20 अगस्त को होनी थी पहली सुनवाई, उससे पहले सचिवालय ने पदोन्नति पर लगाई रोक
अपने भतीजे के मामले में बैक फुट पर प्रदीप दुबे जिनकी स्वयं की नियुक्ति विवादित है वह 30 अप्रैल 2019 को सेवानिवृत हो चुके हैं।
दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय में पदोन्नति और वरिष्ठता निर्धारण को लेकर चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। समीक्षा अधिकारी से अनुभाग अधिकारी पद पर प्रभात दुबे की पदोन्नति को विधानसभा सचिवालय ने निरस्त कर दिया है। खास बात यह है कि इस पदोन्नति को चुनौती देने वाली याचिका की पहली सुनवाई 20 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में निर्धारित थी।
विधानसभा सचिवालय की विज्ञप्ति/प्रकीर्ण संख्या 217/वि०स०/अधि०/6/97 टी०सी०, दिनांक 01 जुलाई 2026 के माध्यम से विभिन्न पदों पर पदोन्नतियां की गई थीं। समीक्षा अधिकारी से अनुभाग अधिकारी पद पर पदोन्नति को लेकर कुछ समीक्षा अधिकारियों ने 17 जून और 14 जुलाई 2026 को प्रत्यावेदन प्रस्तुत कर वरिष्ठता निर्धारण पर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। सचिवालय के आदेश में स्वयं स्वीकार किया गया है कि इन प्रत्यावेदनों के निस्तारण से पहले ही संबंधित पद पर पदोन्नति कर दी गई।
इसी पदोन्नति के विरुद्ध याचिका संख्या ए-8321/2026 माननीय उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में दाखिल की गई। याचिका में वरिष्ठता निर्धारण को लेकर आपत्तियां उठाई गई हैं और इसकी प्रथम सुनवाई 20 अगस्त 2026 को निर्धारित थी।
मामले के बीच विधानसभा सचिवालय ने 19 अगस्त 2026 को कार्यालय ज्ञाप संख्या 284/वि०स०/अधि०/16/26 जारी कर कार्मिकों की वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए एक पृथक समिति गठित कर दी। आदेश के अनुसार समिति की रिपोर्ट के बाद समीक्षा अधिकारियों की अनुभाग अधिकारी पद पर पदोन्नति पर संबंधित नियमों के तहत विचार किया जाएगा।
इसी क्रम में सचिवालय ने अब 01 जुलाई 2026 के आदेश में संशोधन करते हुए प्रभात दुबे की अनुभाग अधिकारी पद पर की गई पदोन्नति को निरस्त कर दिया है। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि वरिष्ठता निर्धारण के बाद सुसंगत नियमों के अनुसार पदोन्नति की जाएगी।
सुनवाई से ठीक पहले फैसले ने बढ़ाई चर्चा
हाईकोर्ट में याचिका की पहली सुनवाई की तारीख और उससे ठीक पहले पदोन्नति निरस्त किए जाने के घटनाक्रम ने विधानसभा सचिवालय की पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर चर्चा को और तेज कर दिया है। हालांकि, सचिवालय के आदेश में किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप सिद्ध किए जाने की बात नहीं कही गई है, लेकिन वरिष्ठता पर आपत्तियों के निस्तारण से पहले हुई पदोन्नति और उसके बाद पदोन्नति निरस्त किए जाने ने प्रक्रिया पर गंभीर सवाल जरूर खड़े किए हैं।
अब पूरे मामले में हाईकोर्ट की कार्यवाही और वरिष्ठता निर्धारण के लिए गठित समिति की रिपोर्ट पर सबकी निगाहें टिकी हैं।