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कंक्रीट के जंगल में बृज लाल ने गौरैया के लिए बचाकर रखा अपना घर

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Dainik India News

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2011 में मिट्टी के गुल्लक से शुरू हुई एक छोटी-सी पहल आज बन गई पक्षियों का बसेरा—बारिश में गौरैया भूखी न रहे, इसलिए घर के ओसारे में अब भी लटकती है धान की सिधरी; बचपन के संस्कारों को प्रकृति के साथ जीने की परंपरा में बदलने की कहानी

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ।लखनऊ में 25 अगस्त की बारिश थमी तो आसमान के साथ एक नन्ही-सी दुनिया भी जाग उठी। बूंदों से भीगे पेड़ों के बीच गौरैया अपने दाने की तलाश में निकल पड़ी। कुछ देर पहले तक लगातार बरस रही बारिश ने उसे घर से बाहर निकलने नहीं दिया था। लेकिन जैसे ही मौसम खुला, वह उसी घर के आंगन में फुदकती दिखाई दी, जहां उसके लिए केवल दाना ही नहीं, बल्कि एक सुरक्षित आश्रय भी वर्षों से सुरक्षित रखा गया है। यह किसी पक्षीघर की औपचारिक व्यवस्था नहीं, बल्कि पूर्व डीजीपी और राज्यसभा सदस्य बृज लाल के उस भावनात्मक संसार का हिस्सा है, जिसमें गौरैया उनके लिए महज एक पक्षी नहीं, घर की सदस्य और बचपन की स्मृतियों की जीवित निशानी है।

कहानी वर्ष 2011 में शुरू होती है। लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार में बृज लाल अपना मकान बनवा रहे थे। उसी दौरान गौरैया का एक जोड़ा वहां पहुंचा। पक्की होती दीवारों और बढ़ते कंक्रीट के बीच उस जोड़े को देखकर उन्हें लगा कि जैसे गौरैया उनसे सवाल कर रही हो—“आप अपने लिए पक्का घर बना रहे हैं, हमारे लिए भी कोई ठिकाना रखेंगे?” यह कल्पना भर नहीं थी; यह उस बदलाव की टीस थी जिसमें कभी मनुष्य के घरों के साथ रहने वाली गौरैया स्वयं अपने घर की तलाश में भटकने लगी थी।

कभी फूस और खपरैल के घर गौरैयों के स्वाभाविक आश्रय हुआ करते थे। छतों की कड़ियों, मिट्टी की दीवारों और घर के कोनों में उनके घोंसले बनते थे और मनुष्य उनके साथ सहज सह-अस्तित्व में रहता था। गांवों तक में जब कंक्रीट के मकानों का विस्तार हुआ तो उन छोटे-छोटे आश्रयों का संसार सिमटता चला गया। बृज लाल ने उसी क्षण तय किया कि उनके नए घर में गौरैया के लिए भी जगह होगी।

उन्होंने अपने सुरक्षा कर्मी मोहम्मद असलम को बाजार भेजकर मिट्टी के कई गुल्लक मंगवाए। उन्हें कुछ देर पानी में भिगोया गया और फिर उनमें गौरैया के आने-जाने लायक छोटे छेद बनाए गए। छेद इतना बड़ा नहीं रखा गया कि शिकारी पक्षी भीतर तक पहुंच सकें। इस तरह मिट्टी के साधारण गुल्लक गौरैयों के लिए सुरक्षित घोंसलों में बदल गए। एक पक्के मकान की दीवार पर मिट्टी का वह छोटा-सा आशियाना मानो आधुनिक जीवन और प्रकृति के बीच टूटते संवाद को फिर से जोड़ने लगा।

यहीं से शुरू हुआ संरक्षण का वह सिलसिला, जो पंद्रह वर्ष बाद भी जारी है। बृज लाल के लखनऊ आवास में वर्ष भर पक्षियों के लिए बाजरा, कांगनी और खुदी यानी टूटे चावल के दाने रखे जाते हैं। घर के सामने लखनऊ विकास प्राधिकरण की अनुमति से लगभग 15 हजार वर्गफुट क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के वृक्ष लगाए गए। कभी लगाए गए वे पौधे अब बड़े पेड़ों का रूप ले चुके हैं और उनके बीच पक्षियों की कई प्रजातियों ने अपना संसार बसा लिया है।

गौरैया के साथ मुनिया, बुलबुल, फाख्ता, सेवन-सिस्टर्स यानी जंगल बैबलर, कोयल, कौवा, महोखा, किलहट, मैना, सनबर्ड और भुजंगा जैसे पक्षियों की आवाजाही अब इस परिसर की पहचान है। कई पक्षियों ने यहां अपना स्थायी बसेरा बना लिया है और प्रजनन भी कर रहे हैं। बरसात में कभी पपीहा पहुंच जाता है और उसका ‘पी कहाँ, पी कहाँ’ वातावरण में विरह का लोकगीत घोल देता है। एक बार चातक ने भी यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। धनेश का जोड़ा तो बगीचे में लगे जमैकन चेरी और अंजीर के फलों का स्वाद लेने अक्सर पहुंच जाता है।

लेकिन इन तमाम पक्षियों के बीच गौरैया का रिश्ता सबसे अलग है। उसका नाम ही ‘हाउस स्पैरो’ इसलिए पड़ा कि उसका जीवन मनुष्य के घरों से जुड़ा रहा है। बृज लाल के लिए भी वह घर से बाहर की कोई मेहमान नहीं, बल्कि घर के भीतर रहने वाली पुरानी परिचित है। उसकी चहचहाहट में उन्हें अपने बचपन का वह गांव सुनाई देता है, जहां आंगन और मुंडेर पर गौरैयों की फुदकन घर की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थी।

उनकी स्मृतियों में गौरैया से जुड़ा बचपन आज भी उतना ही जीवंत है। गांव में कभी टोकरी के नीचे दाना रखकर गौरैया को पकड़ लिया जाता था और उसे गुलाबी रंग से रंग दिया जाता था। जब वह गुलाबी गौरैया आंगन और घर की मुंडेर पर फुदकती थी तो बाल-मित्रों के बीच गर्व से कहा जाता—“यह मेरी गौरैया है।” उस समय यह बालसुलभ शरारत थी, लेकिन पक्षियों के प्रति अपनापन घर के संस्कारों में रचा-बसा था। माता-पिता और बुजुर्ग पक्षियों के लिए भोजन रखते, उनके लिए जगह बनाते और बच्चों को सिखाते कि घर केवल मनुष्यों का नहीं होता।

बरसात में यह सीख और भी अर्थपूर्ण हो जाती थी। गर्मियों में खेतों और आसपास के खुले स्थानों में अनाज तथा घास के बीज मिल जाते हैं, लेकिन लगातार बारिश में गौरैया के लिए दाना तलाशना कठिन हो जाता है। कीड़े-मकोड़े उसे प्रोटीन जरूर उपलब्ध कराते हैं, मगर जब वर्षा इतनी तेज हो कि वह बाहर निकल ही न सके, तब घर के भीतर रखा थोड़ा-सा अन्न उसके लिए जीवन का सहारा बन सकता है।

बृज लाल को याद है कि गांव में बरसात के दिनों में उनकी मां कहा करती थीं कि गौरैया “उपवास” न करने पाए। बारिश में जब वह बाहर नहीं निकल सकती थी, तब घर में पका हुआ चावल ओसारे में रख दिया जाता था। यह किसी अभियान का हिस्सा नहीं था। न कोई योजना, न कोई प्रचार। यह केवल करुणा थी—एक ऐसी करुणा जो घर के बुजुर्गों से बच्चों तक संस्कार बनकर पहुंचती थी।

धान की कटाई के बाद बालियों से बनाई जाने वाली ‘सिधरी’ भी इसी परंपरा का हिस्सा थी। धान की कलात्मक गुच्छियां बनाकर उन्हें ओसारे में लटकाया जाता था। वह घर की शोभा बढ़ाती थीं, लेकिन उनके भीतर छिपा एक और अर्थ था—बरसात और कठिन मौसम में गौरैयों के लिए भोजन उपलब्ध रहे। आज वही परंपरा बृज लाल के लखनऊ आवास में भी जीवित है। उनके भाई गोविंद लाल द्वारा बनाई गई धान की सिधरी ड्राइंग रूम से लगे बरामदे की शोभा बढ़ा रही है और साथ ही घर की गौरैयों को दाना भी उपलब्ध करा रही है।

यही इस कहानी का सबसे भावपूर्ण पक्ष है—एक ओर आधुनिक शहर का कंक्रीट है और दूसरी ओर धान की सिधरी; एक ओर बदलता जीवन है और दूसरी ओर मां से मिले संस्कार; एक ओर मिट्टी का गुल्लक है और दूसरी ओर गौरैया का घोंसला।

बृज लाल के आवास में पक्षियों के संरक्षण की यह व्यवस्था किसी बड़े अभियान से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सवाल से शुरू हुई थी—“हम अपने लिए घर बना रहे हैं, इनके लिए क्या कर रहे हैं?” उस सवाल का उत्तर आज पेड़ों पर सुनाई देती चहचहाहट में मिलता है।

गौरैया को बचाने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। कभी एक मिट्टी का छोटा पात्र पर्याप्त होता है, कभी मुट्ठी भर दाना और कभी बरामदे में लटकती धान की सिधरी। आवश्यकता केवल इतनी है कि मनुष्य अपने आसपास की दुनिया में दूसरे जीवों के लिए भी थोड़ी-सी जगह बचाए।

बृज लाल की कहानी इसी भूले हुए संस्कार को फिर से याद दिलाती है—घर वह नहीं, जिसमें केवल मनुष्य रहते हैं; घर वह है जिसमें प्रकृति के लिए भी एक कोना बचा हो। और शायद इसीलिए बारिश के बाद जब गौरैया उनके आंगन में उतरती है, तो वह केवल दाना चुगने नहीं आती; वह उस पुराने रिश्ते की खबर देने आती है, जिसमें मनुष्य और पक्षी एक-दूसरे के घर का हिस्सा हुआ करते थे।

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