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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मंच से सिंहनाद: ‘रश्मिरथी’ के बहाने राष्ट्रचेतना को पुनर्जागृत करने का आह्वान”

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मंच से सिंहनाद: ‘रश्मिरथी’ के बहाने राष्ट्रचेतना को पुनर्जागृत करने का आह्वान”
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दिनकर की वाणी से उपजा आत्ममंथन, जातिवाद पर प्रहार और नवभारत के संकल्प का उद्घोष

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साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रधर्म का अद्वितीय संगम—लखनऊ में ‘रश्मिरथी पर्व’ बना विचारों का महाकुंभ

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दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ, 24 अप्रैल 2026।राजधानी का सांस्कृतिक क्षितिज उस समय असाधारण तेजस्विता से आलोकित हो उठा, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृति रश्मिरथी के हीरक जयंती वर्ष एवं उनकी 52वीं पुण्यतिथि पर आयोजित ‘रश्मिरथी पर्व’ के शुभारम्भ अवसर पर अपने ओजस्वी विचारों से मानो समूचे वातावरण में चेतना का विद्युत-संचार कर दिया। यह कोई साधारण संबोधन नहीं था—यह उस युग की पुनरावृत्ति थी, जहाँ शब्द केवल उच्चारित नहीं होते, बल्कि इतिहास की दिशा निर्धारित करते हैं।

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कार्यक्रम का प्रारंभ जैसे ही स्मारिका ‘रश्मिरथी से संवाद’ के विमोचन और दिनकर जी के सुपौत्र रित्विक उदयन के सम्मान से हुआ, वैसे ही यह स्पष्ट हो गया कि यह आयोजन केवल स्मरण का नहीं, बल्कि विरासत के पुनर्सृजन का पर्व है। उस क्षण में अतीत की गरिमा और वर्तमान की चेतना एक साथ उपस्थित थीं—और यह संगम उपस्थित जनसमूह के भीतर एक नई जिज्ञासा, एक नई उत्कंठा को जन्म दे रहा था।

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मुख्यमंत्री के उद्बोधन ने जैसे ही विस्तार पाया, शब्दों ने अपनी सीमाओं को लांघते हुए विचारों का एक विराट आकाश निर्मित कर दिया। उन्होंने दिनकर को ‘साहित्य का शलाका पुरुष’ बताते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में राष्ट्र की आत्मा सजीव रूप में विद्यमान है। यह केवल प्रशंसा नहीं थी—यह उस शक्ति की पहचान थी, जो साहित्य को समाज का पथप्रदर्शक बनाती है। जैसे-जैसे यह विचार गहराता गया, श्रोताओं के भीतर यह प्रश्न और तीव्र होने लगा कि क्या हम उस चेतना के अनुरूप स्वयं को ढाल पाए हैं?

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किन्तु यह विमर्श केवल गौरवगान तक सीमित नहीं रहा। मुख्यमंत्री ने भारत की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख करते हुए स्वीकार किया कि हमारी आंतरिक कमजोरियों ने हमें बार-बार पराधीनता के गर्त में धकेला। दिनकर की लेखनी ने इन कमजोरियों पर जिस निर्भीकता से प्रहार किया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह कथन जैसे ही वातावरण में गूंजा, श्रोताओं के भीतर एक गंभीर आत्ममंथन का आरंभ हो गया—और यही इस संबोधन की सबसे बड़ी शक्ति थी।

जातिवाद के प्रश्न पर जैसे ही दिनकर की पंक्तियाँ उद्धृत की गईं, सभागार में एक गहन निस्तब्धता छा गई। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यदि भारत को सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करना है, तो जातिगत विभाजनों से ऊपर उठना होगा। यह केवल सामाजिक सुधार का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व का प्रश्न है—और यही वह क्षण था, जहाँ हर श्रोता स्वयं से संवाद करने को बाध्य हो गया।

इसी क्रम में ‘रश्मिरथी’ पर आधारित नाट्य मंचन ने कर्ण के चरित्र को इस प्रकार जीवंत किया कि दर्शक केवल दर्शक नहीं रहे—वे उस संघर्ष, उस पीड़ा और उस गौरवगाथा के सहभागी बन गए। यह प्रस्तुति केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि आत्मा को उद्वेलित कर देने वाला अनुभव थी, जिसने हर हृदय में एक अनकहा प्रश्न छोड़ दिया—क्या हम अपने समय के कर्ण को पहचान पा रहे हैं?

आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा ने इस सांस्कृतिक महोत्सव को और भी व्यापक बना दिया। दूसरे दिन स्वामी विवेकानन्द के जीवन पर आधारित नाट्य मंचन और तीसरे दिन बाल गंगाधर तिलक के व्यक्तित्व पर केंद्रित प्रस्तुति के साथ-साथ अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं पर आधारित ‘अटल स्वरांजलि’—यह सब मिलकर इस आयोजन को केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैचारिक क्रांति का स्वरूप प्रदान कर रहे हैं।

अंततः यह स्पष्ट हो गया कि ‘रश्मिरथी पर्व’ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक चेतना है—एक ऐसा आह्वान, जो साहित्य के माध्यम से राष्ट्र की दिशा निर्धारित करने का साहस रखता है। यह आयोजन मानो यह उद्घोष कर रहा था कि जब शब्दों में सत्य और संवेदना का संगम होता है, तो वे केवल प्रेरणा नहीं देते, बल्कि इतिहास भी रचते हैं—और यही अनुभूति इस पूरे समारोह को अविस्मरणीय बना गई।

कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्यजनों की गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को और अधिक विशिष्टता प्रदान की—उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह, राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा, लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे, अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात, दिनकर स्मृति न्यास के अध्यक्ष नीरज कुमार, राष्ट्रीय सनातन महासंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह, सहित अनेक विशिष्ट अतिथियों की श्रृंखलाबद्ध उपस्थिति ने इस सांस्कृतिक महोत्सव को ऐतिहासिक ऊँचाई प्रदान की।

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