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25 जून 1975: लोकतंत्र पर सबसे क्रूर हमला,इंदिरा गांधी सरकार ने की थी संविधान की हत्या

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Dainik India News

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25 जून 1975: लोकतंत्र पर सबसे क्रूर हमला,इंदिरा गांधी सरकार ने की थी संविधान की हत्या

संघ बना अडिग प्रहरी — जब पूरा देश घुटनों पर था, तब आरएसएस ने दिया प्रतिरोध को दिशा और शक्ति

आपातकाल की 50वीं बरसी पर देश ने किया संविधान की हत्या को याद, और नमन किया उन लाखों सेनानियों को जिन्होंने जेलों में यातनाएं सहकर भी लोकतंत्र की लौ बुझने नहीं दी

दैनिक इंडिया न्यूज़, लखनऊ । 25 जून 1975 — भारतवर्ष के लोकतांत्रिक इतिहास का वह सबसे काला दिन, जब संविधान को ठेंगा दिखाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित किया। लोकतंत्र को अपने पैरों तले रौंदते हुए सत्ता की लोलुपता ने नागरिक स्वतंत्रता को कुचल डाला।

लेकिन इस अंधकार के दौर में जब राजनीतिक दल बिखर गए, मीडिया मौन हो गया, न्यायपालिका दबाव में थी और आमजनता भय में थी — तब एक संगठन था जिसने न केवल हिम्मत दिखाई, बल्कि पूरे आंदोलन को एक अनुशासित, विचारशील और संगठित दिशा दी। वह था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) — जो न तो सत्ता से डरा, न ही प्रताड़नाओं से झुका।

संघ ने निभाई समुद्र मंथन में कर्म की भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक और वरिष्ठ विचारक के एन गोविंदाचार्य ने सटीक टिप्पणी करते हुए कहा —

“जिस प्रकार समुद्र मंथन में ककक्ष्प अवतार ने मंदराचल पर्वत को संतुलित किया था, उसी प्रकार आपातकाल में संघ ने पूरे प्रतिरोध आंदोलन को स्थिरता और संतुलन दिया।”

आपातकाल का विरोध सिर्फ नारेबाज़ी नहीं था — उसे सुव्यवस्थित करने, भूमिगत कार्यकर्ताओं को सुरक्षा देने, जेलों में बंद नेताओं के परिवारों तक सहयोग पहुंचाने, तथा पूरे राष्ट्र को वैचारिक जागरण देने का कार्य RSS ने पूरी निष्ठा से किया।

हजारों स्वयंसेवकों ने झेला दमन — लेकिन झुके नहीं

आपातकाल के दौरान संघ के हजारों स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया गया। इनमें अनेक ऐसे थे जो वर्षों तक जेल में बंद रहे, लेकिन न तो माफ़ी मांगी, न ही संगठन के सिद्धांतों से विचलित हुए। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा को धर्म समझकर प्रतिरोध किया। संघ के गुप्त संदेश तंत्र ने भूमिगत आंदोलन को जीवंत बनाए रखा।

कई स्वयंसेवक, जो सार्वजनिक रूप से राजनीति में नहीं थे, लेकिन साइलेंट सपोर्ट के रूप में नेताओं को आश्रय, संसाधन और मार्गदर्शन देते रहे — वही वह अदृश्य शक्ति थी जिसने विपक्ष को ताकतवर बनाए रखा।

संघ का वैचारिक बल: जेपी आंदोलन की रीढ़

आपातकाल से ठीक पहले जो जेपी आंदोलन खड़ा हुआ, उसकी वैचारिक प्रेरणा में संघ का विशेष योगदान था। जयप्रकाश नारायण स्वयं संघ की कार्यशैली, अनुशासन और राष्ट्रवाद से प्रभावित थे। उन्होंने स्वयं कहा था —

“अगर मुझे राष्ट्र का पुनर्निर्माण करना हो, तो मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा अनुशासित संगठन चाहता हूँ।”

जेपी आंदोलन में भाग लेने वाले लाखों युवाओं को संघ ने वैचारिक स्पष्टता, नैतिक दृढ़ता और संगठनात्मक संयम प्रदान किया। यही कारण था कि आंदोलन केवल प्रतिक्रियात्मक न रहकर रचनात्मक बन पाया।

जब नेता जेल में थे, संघ परिवार मैदान में था

जब कांग्रेस ने सत्ता के दमनचक्र से पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया था, तब संघ परिवार — विशेषकर विद्यार्थी परिषद, सेवा भारती, भारत विकास परिषद, भारतीय मजदूर संघ जैसे अंग — जनमानस को जागरूक करते रहे। भित्ति चित्रों, पर्चों, गोपनीय पत्रिकाओं, व स्थानीय संवादों के माध्यम से संघ ने जनता के बीच में आपातकाल की वास्तविकता पहुँचाई।

संघ से जुड़े कार्यकर्ता छद्म नामों से गाँव-गाँव जाकर लोगों को समझाते थे कि “देश में अघोषित तानाशाही लागू है”, और “लोकतंत्र की रक्षा हेतु जागना होगा।”

लोकतंत्र की रक्षा में संघ का योगदान अनमोल

संघ का यह योगदान न कभी सरकारी दस्तावेजों में स्थान पा सका, न इतिहास की पुस्तकों में उचित सम्मान। परंतु आज जब हम आपातकाल की 50वीं बरसी पर आत्मचिंतन कर रहे हैं, तो यह अनिवार्य है कि हम उन हजारों गुमनाम संघ स्वयंसेवकों को नमन करें, जिन्होंने न तो अखबारों की सुर्खियाँ बटोरीं, न पद और सम्मान की चाह रखी — उनका लक्ष्य केवल “राष्ट्र और संविधान की रक्षा” था।

आज भी प्रासंगिक है वह चेतावनी

आपातकाल की यह बरसी हमें बार-बार स्मरण कराती है कि “लोकतंत्र अलभ्य नहीं है — वह सतत जागरूकता और जनसहभागिता से ही सुरक्षित रहता है।”
अगर कोई संगठन है जो सतत राष्ट्र को चेताता रहा है, तो वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसने न केवल आपातकाल में, बल्कि हर संकट काल में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा।

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